सच्चिदानंद सिन्हा के जन्मदिन पर विशेष
आषाढ़ नहीं बरसा। सावन भी बस टपक सा गया, धरती के इस तड़पते हिस्से को छू कर। और छुअन भी ऐसी जिसका एहसास बस एक टीस की तरह उठा और ग़ायब हो गया। 28 अगस्त पूर्णिमा के दिन भाद्र मास ने धरती के इस तड़पते हिस्से को छुआ तो कोना-कोना भींगो गया। मगर सूखी तड़पती प्यास को इतनी आसानी से भिंगोया जा सकता है भला ! भाद्र मास के आगमन को धरती का यह हिस्सा महसूस कर पाये, इसके लिए आज फिर वह झूम-झूम कर बरसी। और इस झूमने में मेरा झूमना शामिल नहीं हो सका, क्योंकि मैं राष्ट्रीयता पर एक लेक्चर तैयार करने में लगी थी, जो आज शाम मुझे युवा छात्रों के बीच देना था। ऐसी कठोर सज़ा ! जैसे बंध- सी गई थी – अपने कर्तव्य और प्रकृति प्रेम के बीच। यह पता था कि इतनी बारिश में छात्रों के आने की संभावना बहुत कम थी, मगर कर्तव्य बोध की वजह से मैं ‘ भारतीय राष्ट्रीयता और सांप्रदायिकता’, सच्चिदानंद सिन्हा जी की पुस्तक और अपने नोट्स से फिर से एक बार गुजरने लगी। छात्र आयें या ना आयें, लेक्चर तैयार होना चाहिए।
पर जाने क्यों अचानक से लगा, सच्चिदा जी अपनी वही बच्चों सी खिलखिलाती हँसी के साथ कह रहे हों- ‘क्यों रोक रही ख़ुद को, जाओ घूम आओ।’ हालाँकि, मुझे अच्छी तरह पता है कि ख़ुद सच्चिदा जी मेरी जगह होते तो वह लेक्चर फाइनल कर छात्रों का इंतज़ार कर रहे होते। एकदम पक्के – समय के और ज़ुबान के।

मगर मन कब बंधना चाहता है – ना वह बंधा, ना ही उसने बांधा ! आज के कोटे में हमारे हिस्से या यूँ कहें धरती के इस हिस्से में इतनी ही बारिश थी। बारिश रुकी। और हम चले, मोतियों को समेटने नहीं, उसे निहारने।
बगीचे में हम अलसाये एक -एक पत्ते पर टपकती बूँदों में राष्ट्र निर्माण के इतिहास की छाया देख रहे थे। और जो इन सब में अद्भुत था – पत्तों पर टपकी बूँदों में आसमान का उतर जाना।
एक नन्ही बूँद में आसमान की परछाईं ! कौन सा बोध था वह जो ‘कल्पना के क्षितिज’ में राष्ट्रीयता को जन्म दे रहा था। अवधारणायें अलग-अलग थीं। इतने में मुझे एक बेहद नन्हा, मतलब सच में नन्हा, हाँ, नन्हा मेढ़क दिखा, इतना नन्हा और फुर्तीला कि मैंने उसके पीछे भागना शुरू तो किया तो वह कहीं ऐसे बिला गया घनी नन्ही झाड़ियों में कि निरर्थक लगा उसे ढूँढना। आज स्टडी क्लास में बस दो छात्र आये – लवकेश और सुजीत। बिहार विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. कर रहे छात्र सुजीत ने पूछा – ‘वह सब तो ठीक है, मगर क्यों यह सीमा, क्यों यह अलग-अलग देश, मतलब अजीब सा नहीं लगता।’ सवाल तो बिलकुल सही था।क्योंकि यह प्रश्न बचपन से मेरे मन में भी चलता रहा है, और कई सारे बच्चों और युवाओं के मन को भी बेचैन करता होगा। मैंने कहा, ‘इस पर हम बात करेंगे। और अगर मेरी पूछो तो मैं स्वयं की पहचान को इतना विराट पाती हूँ कि यह किसी जाति, धर्म, देश, महादेश जैसी बाउंड्री में नहीं समाती। और कभी समा भी नहीं पाएगी। इतना छोटा बनना ही नहीं है हम मनुष्यों को कि बस इतने में हमारी पहचान सीमित हो जाये। मगर ठीक है, एक भौगोलिक और राजनीतिक स्ट्रक्चर है जिसका हम सब हिस्सा हैं, उसके कुछ टेक्निकल पक्ष हैं। जैसे कहीं बाहर देश जाएँगे तो बताना तो पड़ेगा कि हम कहाँ से आए हैं। उतना तो ज़रूरी है। मगर यह पहचान हमारी समझ और व्यक्तित्व को, हमारी अपनी असल पहचान को सीमित कर दें, यह नहीं होना है।’ सुजीत की बेचैनी कम हुई हो, ऐसा मुझे नहीं लगा। मैंने कहा – ‘ एक बार राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया यूरोप और भारत में कैसे हुई और सच्चिदानंद जी की पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रीयता और सांप्रदायिकता’ इसे पढ़ समझ लेंगे तो कई प्रश्न के उत्तर स्वयं मिल जाएँगे, और ना मिले तो लेक्चर के बाद हम बात करेंगे इस पर।’ सच्चिदानंद सिन्हा अपनी पुस्तक‘ भारतीय राष्ट्रीयता और सांप्रदायिकता’ में बताते हैं कि भारतीय संदर्भ में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का केंद्र संस्कृति रहा, यूरोप की राष्ट्रीयता के निर्माण से बिलकुल भिन्न ।
सच्चिदानंद सिन्हा कोई आम व्यक्ति नहीं थे। या यूँ कहें इतने आम थे कि उनके जैसा शायद ही अब कोई दूसरा ख़ास पैदा हो। जब हम नेक लोगों से मिलते हैं, तो ऐसा लगता है ऊपर बैठे किसी फ़रिश्ते ने ख़ुद हाथ उठा कर हमारे लिए दुआ माँगी हो। और मेरे लिए तो यह शत प्रतिशत सही है। बचपन से यही लगता कि क्यों लोग एक-दूसरे को प्यार कर नहीं पाते। इतना क्षणिक क्यों होता है किसी के लिए प्रेम कि जरा सी बात पर वह उस नन्हे मेढ़क की तरह उछल कर ग़ायब हो जाता है ! कोई तो होगा इस धरती पर जो सबको एक समान प्रेम करना जानता होगा।मुझे उस व्यक्ति से मिलना है। बचपन की मासूमियत में बड़ा साहस होता है, वह हमेशा अपने मन में कहता – ‘और अगर ऐसा कोई व्यक्ति ना मिला तो क्या हुआ मैं सीखूँगी प्रेम करना, सब से एक समान प्रेम करना’ । ईश्वर की उपस्थिति या अनुपस्थित के बारे में तब हमें सोचने की फुर्सत नहीं थी, क्योंकि हमारा सारा ध्यान तो इस पर था कि लोग क्यों प्रेम नहीं कर पाते एक-दूसरे से, उनका प्रेम इतना बाहरी क्यों होता है, टिकता क्यों नहीं। मगर एक ही रट या यूँ कहें एक ही लगन लगी- सबसे समान रूप से प्रेम करने की। मगर यह डगर इतनी आसान कहाँ थी ! अपने ही अहं को बार बार साक्षी बन देखना होता, अपनी इच्छाओं को रूपांतरित करना होता है और भी ना जाने कितना कुछ।ठीक ही कहते हैं प्रेम एक कला है और इसके लिए ख़ुद को साधना होता है। और यह कठिन साधना बचपन से शुरू हो गई। आज सुजीत जैसे युवाओं और बच्चों के मन में उठने वाले मासूम सवालों से मिलती हूँ तो रू-बू-रू हो जाती हूँ ख़ुद से। बचपन से एक समाजशास्त्री की तरह लोगों के व्यवहार और जीवन को देखा तो धीरे धीरे जाना कि प्रेम आवश्यकता से जुड़ा है। आवश्यकता के अनुरूप प्रेम बदलता है। मनुष्य की आम मानसिकता ही ऐसी है। जैसे-जैसे बड़ी होती गई रहस्य के पर्दों के आर-पार की दुनिया दिखने लगी। एक एक कर पर्दे उठते-गिरते चले गये। तब लगा प्रेम करना जैसा कुछ तो होता ही नहीं। हम स्वयं प्रेम हैं। फिर तो मुझे कुछ करना ही नहीं था। जो मैं हूँ, उसे होने की ज़रूरत क्या है। मगर जो हम समझ पाते हैं, वह सभी समझें, ऐसा तो नहीं। दिमाग़ की कसरत या मन की खोज किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने कि जो सबसे समान रूप से प्रेम करता हो, कहीं खो सी गई।

फिर मिले सच्चिदानंद जी। बचपन की खोज से एक रोज़ ऐसे मिलना होगा, नहीं पता था। उनको बहुत लंबे समय से जानती थी। पिता जी के कारण मूल रूप से, बाद में अपने आंदोलन से जुड़ाव और किसानों की समस्या पर एक बड़े कार्यक्रम के आयोजन के संदर्भ में। मगर वास्तव में जब मैं उनके निकट गई, तमाम शोर से दूर हो कर, तब मैंने जाना यह व्यक्ति अपने भीतर अनंत गाथाओं को समेटे जिस सहजता से बच्चों की तरह खिलखिलाता है, उसकी हर गाथा में प्रेम है, प्रेम के अलावा तो कुछ भी नहीं। और यह गाथा एक नहीं दो शताब्दियों की है। और इस तरह मैं इन प्रेम गाथाओं के समुंदर में गोते लगाने लगी। शुरुआत हुई उनकी जीवनी लिखने की। और एक रोज़ मैंने जाना – सच्चिदानंद कुछ और नहीं, प्रेम हैं । सच्चिदानंद सिन्हा, प्रख्यात समाजवादी चिंतक और लेखक कोई और नहीं प्रेम हैं ।और कुछ भी नहीं। उनकी हर पहचान वह चाहे एक मज़दूर या श्रमिक की हो, एक किसान की हो, एक राजनीतिक कार्यकर्ता, एक वक्ता, एक लेखक, एक समाजवादी विचारक व चिंतक की हो या एक बौद्धिक मनुष्य की हो, सब एक ही जगह आकर घुल-मिल जाती है- प्रेम में।
बेपनाह मोहब्बत थी उनमें, हर किसी को उतनी ही शिद्दत से चाह लेने वाला हृदय था उनके पास। बेपनाह मोहब्बत में हम रहे। अगर उनसे यूँ इस तरह ना मिली होती तो बचपन की अभीप्सा महज़ कल्पना बन कर रह जाती। ख़ुद की उच्च अभीप्साओं को बल मिला। जीवन के उद्देश्यों को बल मिला। हम एक से थे कई मायनों में। वे कहते थे, ‘एक ही बात हमारे बीच मेल नहीं खाती- तुम इतना साफ़-सुथरा रहती हो, हर कुछ को ऐस्थेटिकली अरेंज कर रखती हो, तुम्हारी बेतरतीबी में भी एस्थेटिक्स होता है, और मैं एकदम अराजक, इधर उधर बिखरा हुआ।’
सच्चे अर्थों में महान कहे जाने वाले इस व्यक्ति को न जानने वाले लोग जल्दी ही उन्हें जानेंगे उनकी जीवनी के माध्यम से। जिस पर आख़िरी चरण का काम चल रहा। उनके व्यक्तित्व की महानता के हर पक्ष को उद्भासित करने का कार्य बड़ा बन जाता है, ख़ासकर तब जब वह नहीं रहे इस दुनिया में। जीवनी पर बार-बार हर पक्ष पर बारीकी से काम करना, क्योंकि यह जीवनी एक राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता के साथ साथ एक ऐसे मनुष्य की है जिसने तमाम सामाजिक राजनीतिक बदलावों को एक अलग ही दृष्टि से देखा है। सच्चिदानंद जी ने ख़ुद को एक राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता से ज़्यादा कभी कुछ भी नहीं माना।
30 अगस्त। आज ही के दिन सन् 1928 को प्रख्यात समाजवादी चिंतक, लेखक सच्चिदानंद सिन्हा जी का जन्म उनके पैतृक गाँव परसौनी, साहेबगंज, बिहार में हुआ। पिछले वर्ष 19 नवंबर को वह 98वें वर्ष की उम्र में प्रवेश करने के कुछ महीने के अंदर ही इस धरती को बेहद शांन्ति से चुपचाप अलविदा कह गये। उनके रहते ही दि यूनिवर्सिटी ऑफ़ दि फ्यूचर ने उनके सामने एक विस्तृत कार्यक्रम की रूप रेखा रखी थी जिसमें उनके ही सरीखे लेखक, शिक्षाविद, सामाजिक राजनीतिक कर्मठ लोगों जिनमें – सुनील, अनिल सद्गोपल, अनुपम मिश्र, ब्रह्मदेव शर्मा, ज्ञानसिंह, जैसे गाँव समाज से पूर्ण रूप से जुड़े और समानता आधारित समाज की कल्पना को साकार करने का काम करने वाले लोगों, एवं गांधी जी सरीखे अन्य व्यक्तियों की किताबों को गाँव के युवा छात्रों के बीच ले जाकर, पठन -पाठन और चर्चा कर देश, दुनिया और समाज निर्माण की प्रक्रिया को बेहतर तरीक़े से समझे जाने में मदद करने की योजना रखी थी। सच्चिदा जी के साथ इस शैक्षणिक कार्यक्रम के बारे में उनसे विस्तृत चर्चा हुई थी, और इसकी पहली पहल पर वह बेहद प्रसन्न भी हुए थे।हालाँकि उन्होंने पहला प्रश्न यह किया था कि ‘मेरी ही किताब से इसकी शुरुआत क्यों करना चाहती हो तुम, और भी तो लोग हैं, गांधी जी से क्यों नहीं शुरू किया तुमने।’ जवाब में उनसे कहा था, ‘आपसे शुरू करने के दो कारण हैं – पहला आपकी लेखनी के माध्यम से युवा छात्र भारतीय समाज के परिवर्तन के विभिन्न चरणों को बेहतर तरीक़े से समझ पायेंगे, यही नहीं संस्कृति के बनने और परिवर्तित होने की प्रक्रिया को भी समझ पायेंगे; दूसरा कारण आप हम सब के बीच हैं, छात्रों को आपसे मिलवाने के लिए ले कर आऊँगी, और वे अपने प्रश्न स्वयं आपके सामने रखेंगे। यही नहीं वह गांधी जी या अन्य लोगों को उन्होंने कभी देखा नहीं। आज गांधी उनके लिए एक इतिहास से ज़्यादा कुछ भी नहीं। आपको देखने से, आपकी जीवनशैली को देखने से वह गांधी की सादगी पर विश्वास कर पायेंगे। आप उनके बीच के हैं, गाँव में रहते हैं- वे कहीं ज़्यादा आपसे ख़ुद को जोड़ पायेंगे, इस तरह छात्र आपकी लिखनी से भी जुड़ पाने में सक्षम होंगे, तब उनकी सोच को बल मिलेगा, वह संवाद करने की बेहतर स्थिति में आ पायेंगे।’ सच्चिदा जी ऐसे तमाम प्रयासों से प्रसन्न थे। वह कहते थे कि ऐसे काम समाज की चेतना को जीवित रखने का काम करती है।
सच्चिदानंद जी चले गये, मगर दि यूनिवर्सिटी ऑफ़ दि फ्यूचर की ओर से यह कार्यक्रम निरंतर चल रहा है। दि यूनिवर्सिटी ऑफ़ दि फ्यूचर के तत्वाधान में हर शनिवार को चलने वाले स्टडी ग्रूप में अभी सच्चिदानंद जी की किताब ‘भारतीय राष्ट्रीयता और सांप्रदायिकता’ को पढ़ा जा रहा है ।

युवा छात्र बेहद संवेदनशील हैं। वह दुनिया समाज के विभिन्न मुद्दों को समझने की अभीप्सा रखते हैं। उस पर बात करने के लिए बेचैन हैं। मगर कोई बात करने वाला नहीं। छात्र, शिक्षकों के बीच का संवाद लगभग ख़त्म है, जहां किसी भी व्यक्तिगत, सामाजिक या राजनीतिक विषयों पर अपने शिक्षकों से छात्र खुल कर चर्चा कर सकें। शिक्षक तो छात्रों को मूल पाठ के ऐतिहासिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक पक्ष तक को रेखांकित कर पाने में सक्षम नहीं। ऐसे में स्टडी ग्रुप में हर हफ़्ते आकर वे सिर्फ़ हफ़्ते भर उन्होंने क्या पढ़ा इसे ही साझा नहीं करते बल्कि शिक्षा, समाज और व्यवस्था से जुड़े प्रश्न भी साझा करते हैं और उस पर खुल कर चर्चा करते हैं । इस स्टडी ग्रुप का हिस्सा ज़्यादातर वे छात्र हैं जो सुदूर गाँवों से मुज़फ़्फ़रपुर शहर के कॉलेजों और विश्वविद्यालय में पढ़ने आये हैं। छात्र सिर्फ़ सच्चिदा जी की किताब पढ़ ही नहीं रहे, बल्कि उस किताब के माध्यम से भारत और यूरोप में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को भी समझने की कोशिश कर रहे। ऊपर से बेहद सरल दिखने वाले इस प्रयास के पीछे एक गहन दृष्टि है जो उस प्रक्रिया से जुड़ी है जिसे मैं युवाओं के बीच ले कर आना चाहती रही लंबे समय से – वह यह कि वे देख, जान और समझ सकें अपने देश प्रेम की गहराई को। देश प्रेम सिर्फ़ किसी देश के झंडे को लहरा देने से नहीं होता। जब तक देश के निर्माण की प्रक्रिया, राष्ट्र शब्द की व्युत्पत्ति नहीं जानेंगे, भारतीय राष्ट्रीयता को नहीं समझेंगे क़रीब से, वह नहीं जान पायेंगे वे अपने भीतर के छिछले देश प्रेम को, जो एक नशा की तरह फैला दिया गया है, जो देश का ख़याल रखने की बात तो दूर, अपने पैरों पर खड़े होकर विश्वविद्यालय में एक-जुट हो किसी ग़लत के ख़िलाफ़ खड़ा भी नहीं हो सकता। हम जितने सतही होते जा रहे, उतने ही ख़ुद को चालाक प्रगतिशील बनाने की दौड़ में भी लगे हैं। शिक्षकों की कमोबेश यही स्थिति है बिहार में, कुछ शिक्षक भले ही अपवाद स्वरूप हैं।
बहरहाल, छात्र इस संवाद हीन समय में, जहां संवाद का शोर तो है, मगर शिक्षक अपनी डफली बजा रहे , छात्र अपनी डफली बजा रहे, बस इंटरनेट के माध्यम से ज्ञानियों के बखारते ज्ञान में उलझा छात्र शिक्षक उन्हीं की बात दोहरा रहा, और अपने विवेक को तिलांजलि दे, ग़ुलामी के नए दौर का निर्माण कर रहा। वैसे में संवाद की स्थिति का निर्माण करना चुनौती पूर्ण है हर तरह से।पाखंडी मानसिकता और पाखंडी प्रगतिशीलता में गाँवों से शहर आ कर पढ़ने वाले युवाओं का दम घुट रहा है, जहां उनकी आर्थिक, सामाजिक, व्यक्तिगत ज़िंदगियाँ दांव पर लगी हैं ।शिक्षक खाये-अघाये हैं, मोटी वेतनमान उन्हें देर-सबेर मिल ही जाती है।
ख़ैर, सच्चिदा जी की किताब के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया पर छात्र अपनी बनी राय और सोच को लिख भी रहे हैं। इस स्टडी ग्रुप के छात्रों में प्रमुख रूप से सुजीत, लवकेश, रणधीर, वीरू, विक्की, अमरेश, रितिक, नीतेश, ऋषि राज, रंजन, अभिषेक, संदीप आदि शामिल हैं।जैसे-जैसे छात्रों को पता चल रहा, वह जुड़ते चले जा रहे हैं। सबसे दिलचस्प बात है कि ये सभी छात्र अलग अलग विषयों को पढ़ने वाले हैं, अलग -अलग कॉलेज में पढ़ रहे, कुछ विश्वविद्यालय में हैं, अलग-अलग गाँवों से हैं। बारहवीं में पढ़ने वाले छात्र से ले कर स्नातकोत्तर तक के छात्र शामिल हैं।
संख्या क़तई महत्वपूर्ण नहीं, कार्य और उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं।सच्चिदा जी ने भी कई पीढ़ियों का मार्गदर्शन और निर्माण किया है, उस सच्चिदा जी ने जिनका ज्ञान और जिनकी दृष्टि किसी डिग्री की मोहताज नहीं थीं । किसी ऐसे समर्पित व्यक्ति, चिंतक और लेखक के प्रति इससे सच्ची श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि उनके काम को आज के युवाओं के बीच जीवित रखा जा रहा है।उनके काम और उनकी लेखनी मौजूदा पॉलिटिकल डिबेट को समझ पाने में, एक दृष्टि विकसित कर पाने में माध्यम बन रही है आज के युवाओं के लिए।

गीतों के यूनिवर्सल मीनिंग तक पहुँचने की सच्चिदा जी और हमारी तलाश एक सी थी। आज जाने की ज़िद्द ना करो…फ़रीदा ख़ानम का गाया गीत, उन्हें अत्यंत प्रिय था । वह अक्सर कहते – यह किसी एक लिए, एक संबंध के लिए गाया जाये,ऐसा नहीं। इसका एक यूनिवर्सल मीनिंग है, इसकी एक यूनिवर्सल अपील है।“वक़्त की क़ैद में ज़िंदगी है मगर, चंद घड़ियाँ यहीं हैं जो आज़ाद हैं…आज जाने की ज़िद्द ना करो…”
मगर वे चले गये। वे जा रहे थे। मेरे हाथों में उनका हाथ था। हाँ, वे जा रहे थे।मगर अपने प्रिय गीत की पंक्तियाँ जिन्हें मेरे अक्सर उठ कर चलने के समय वह गुनगुनाते या बोलते थे, बेहद धीमी ज़ुबान में, इतना कि कोई दूसरा ना सुन ले ,मैं उनके लिए गा ना सकी। उन्होंने जाने का निश्चय किया था। और वो चले गये। हठी तो थे ही। एक विनम्र हठी। अगर हठी नहीं होते तो दुनिया ने उन्हें कब का बदल दिया होता। कौन रोक सकता था भला उनको।मेरे वजूद का कण कण साक्षी है उनके ग्रेसफुल डिपार्चर का। उनकी हथेलियों के आख़िरी स्पंदन को मैं इस धरती से जाते वक़्त ज़रूर छोड़ जाऊँगी ताकि आने वाली पीढ़ियाँ प्रेम करना नहीं, प्रेम होना जान सकें । उन आख़िरी दो घूँट पानी के जो इन हाथों से उन्होंने पिया था, उन हाथों के मर्मभेदी प्रेम की गर्माहट को, जीवन के प्रति उस उम्मीद को इस धरती को अलविदा कहने से पहले मैं किसी नन्हे सच्चिदा या नन्ही शेफाली को सौंप जाऊँगी ताकि प्रेम हो जाना जान कर आने वाली पीढ़ी नफ़रत और अपने अहं को रूपांतरित कर इस धरती पर समाजवाद को पूरी नवीनता के साथ स्थापित कर सके।

