निभीश कुमार सिंह
“भारत और संपूर्ण विश्व में नशे की बढ़ती लत को देखते हुए, ख़ासकर बच्चों और युवाओं में इसके बढ़ते प्रभावों को देखते हुए ‘द यूनिवर्सिटी ऑफ़ द फ्यूचर’ ट्रस्ट ने एक रिसर्च शुरू किया 2025 में, जिसके तत्वाधान में कई तरह की योजनाओं पर काम हो रहा है। इन्हीं योजनाओं में से एक नशे से संबंधिति बच्चों और युवाओं के लिखित निजी अनुभवों को पुस्तक रूप में शेफाली द्वारा संपादित करने का काम चल रहा। जिसे अलग-अलग खंडों में छोटी कितबिया के रूप में प्रकाशित कर गाँवों, क़स्बों, शहरों में युवाओं और बच्चों तक पहुँचाये जाने की तैयारी चल रही है। इस टीम में देश भर के युवा कलाकार, रंगकर्मी, कवि आदि शामिल हैं साथ ही देश के जाने माने वरिष्ठ साहित्यकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन निरंतर मिल रहा है। इस किताब में शामिल होने वाले कुछ लेख ‘द यूनिवर्सिटी ऑफ़ द फ्यूचर’ चित्रलेखा पत्रिका से साझा कर रहा। इस शृंखला में पहली रचना पटना के निभिश की है जो सिविल सर्विसेज़ की तैयारी कर रहें हैं, और संभावनाओं से पूर्ण एक युवा कवि भी हैं।”
मुझे मालूम था मेरे पिताजी शराब पीते हैं । फिर भी वो हमेशा मुझसे छिपाकर पीते थे। रोज़ नहीं, कभी कभी पीते थे। मैंने कई बार देखा है उन्हें शराब की बोतल को अपने पीठ के पीछे छिपाते हुए तब जब मैं अचानक उस पल आ टपकता जब वह शराब पी रहे होते। आज भी जब वे सिगरेट पीते हैं तो पहले मुझे दूर जाने को कहते हैं या ख़ुद कहीं दूर जाकर पीते हैं । बहुत कम उम्र में उन्होंने नशा को अपना दोस्त बना लिया था। शायद इसलिए वे अपने अनुभव से जानते हैं कि नशा से दोस्ती साँप के जहर से दोस्ती के बराबर है।दादा, पापा, चाचा शराब की बोतल मुझसे छिपा लेते थे लेकिन उनके रगों में घुलने के बाद शराब का असर नहीं छिपा पाते थे। जब भी मैं अपने आस पास के लोगों को नशा करने के बाद हल्ला करते, घर का बरतन तोड़ते, पत्नियों को पीटते, गंदी गंदी गाली बकते हुए सुनता तो नशा के प्रति मेरे मन में घृणा जागती थी। उसी घृणा के कारण मैंने आजतक शौकिया तौर पर भी नशे को अपना दोस्त नहीं बनाया। उस कहानी को सुनकर मुझे घृणा होती है जो मैं अपने पिता के बारे में सुनता हूँ, जो वह मेरे जन्म से पहले थे। जिस तरह मैंने अन्य पुरुष को देखा है नशे के बाद अपनी औरतों को पीटते, अपना घर अपने हाथों से उजाड़ते, मेरे पिता भी अच्छे संगत की शरण लेने से पहले बिल्कुल वैसे ही थे।
जितने बच्चे मेरे साथ कक्षा दसवीं में पढ़ते थे, जिनसे मुझे आशा थी कि ये पिछली पीढ़ी से ज़्यादा समझदार हैं और नशा नहीं करेंगे— उन्हें जब मैंने नशा करते हुए देखता हूँ, तो मुझे यकीन नहीं होता कि क्या ये वही बच्चे हैं जिन्हें समोसा और चॉकलेट पसंद था ! मैं नशा नहीं करता हूँ इस बात का उन्हें आश्चर्य होता है। शायद उन्होंने कहीं से ग़लत अध्याय पढ़ लिया है कि नशा करना बड़ा और ज़िम्मेदार होने की पहली शर्त है, कि नशा टेंशन से मुक्त रखती है, नशा दुःख भोगने नहीं देती, कि नशा ज़हर नहीं जवान शरीर की दवा है।आख़िर उन्हें ये ग़लत पाठ कौन पढ़ा रहा?
मुझे याद है साल 2023 में मैं दिल्ली में था। मेरे गाँव के पास के ही एक परिचित के रिश्तेदार हैं जो “होम मिनिस्ट्री” में नौकरी करते हैं । उनके बच्चे का जन्मदिन था।मैं किसी भी भोज या पार्टी में थोड़ा असहज रहता हूँ। किंतु दिल्ली में घर जैसा भोजन खाने को मिलता नहीं था। तो घर जैसा भोजन खाने की लालच में मैं भी अपने परिचित के साथ उस जन्मदिन के उत्सव में शामिल होने चला गया। सब ने केक खाया, भोजन किया, उसके बाद बिल्डिंग से नीचे उतर कर एक कमरे में पहुँचे। चूँकि मैं देर तक खाना खाता रहा था इसलिए थोड़ी देर से उठा और देर से उस कमरे में पहुँचा। जब मैंने उस कमरे का दरवाज़ा खोला तो देखा – क़रीब बीस पच्चीस लोग बैठे हैं और सबके हाथों में शराब का ग्लास है। उनमें से ज्यादातर किसी सरकारी नौकरी में उच्च पद पर थे और अपने साथ बैठाए उन बच्चों को शराब पीला रहे थे जो दिल्ली में रहकर “सिविल सर्विसेज़ ” की तैयारी कर रहे थे। मेरे साथ बहुत ज़बरदस्ती की उन लोगों ने, मुझे मारने तक की धमकी दी, मेरा मज़ाक़ बनाया । जिनके साथ मैं गया था वे भी उन्हीं की भाषा बोल रहे थे।उनमें से एक व्यक्ति मेरे पिताजी को जानते थे। पिता जी के बारे में भला बुरा कहने लगे कि ‘ख़ुद तो शराब पीते हैं और तुम्हें बुड़बक (बेवक़ूफ़) बनाकर रखा है। तुम इक्कीस साल के हो गए और अब तक शराब नहीं पीते ? फालतू लोगों का फालतू ज्ञान छोड़ो और शराब का आनंद लो’। तरह तरह की बातों से वे मुझे शराब पीने के लिए विवश करना चाहते थे। जितना वे मुझे शराब की खूबियाँ गिनवाते, उतना ही ज़्यादा मुझे शराब से घृणा हो रही थी। मैंने शराब को हाथ नहीं लगाया। वह रात मेरे लिए अब तक की सबसे काली रात थी। वे पल ऐसे थे जैसे किसी हिंदू जाति के बच्चे को कोई गाय और मुसलमान जाति के बच्चे को सुअर का मांस खाने को कहा जा रहा हो। उस रात रूम पर आकर मैं बहुत रोया था और उसके बाद मेरी हिम्मत किसी भी पार्टी में जाने की नहीं हुई, आज भी जब कोई पार्टी का न्योता देता है तो मैं डर जाता हूँ।
::::::::::::::::::::::
संभवत: वो साल 2014 था। पापा असम राज्य जा रहे थे। ट्रेन तय समय से बहुत लेट थी जिसके भोर में आने की संभावना थी। घर से भाड़ा का गाड़ी (टैक्सी ) लेकर हम पटना आए। ट्रेन के इंतज़ार में रात भर पटना जंक्शन पर मेरा रुकना हुआ।पापा गाड़ी में ही सो रहे थे। ड्राइवर कुछ खाने गए थे, मैं गाड़ी में बैठा पटना शहर को देख रहा था। यह वह पटना नहीं था जो कई बार मैं पापा के साथ आकर दिन में देखकर गया था।
दिन वाले पटना में मैंने देखा था औरत-पुरुष को कंधे से कंधा मिलाकर चलते हुए। बुजुर्ग महिला को उनके बेटे नहीं उनकी बहू को डॉक्टर के पास लेकर आते हुए । लड़कियों के कपड़े लड़कों जैसे होते थे, जिनमें वे बहुत खूबसूरत लगतीं । लड़कियों के हाथों में बकरी और खुरपी नहीं, स्कूटी और कलम होता था। दुकान के काउंटर पर बिलिंग करने वाली महिला होती थी। मेरे सामने आकर लड़कियां अपनी नज़रें नीचे नहीं करती थी, आँखों से आँखे मिलाकर देखती। बिना झिझक लड़कों से लड़कियां बाते करती। लड़कियां बदन पर चुनरी नहीं गाड़ी चलाते वक्त हेलमेट पहने रहती थी। सभ्य पुरुष लड़कियों से छूअछूत करने वाले संस्कारों को नहीं मानते थे। लड़कियों को ये नहीं बताते थे कि उन्हें क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं?
पटना में जब इलाज के लिए आना होता था तो यही आकर अपनी मम्मी के घूँघट को उनके माथे से हटा हुआ मैं देखता था। माथे पर बिना आँचल रखी मम्मी और ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती थी। माथे से घूँघट हटाते ही मम्मी औरत से जवान लड़की दिखने लगती थी। माथे को ढककर रखने वाले उन कपड़ों में इतना वजन होता था कि मम्मी का चेहरा हमेशा थका हुआ दिखता था। माथे से उन कपड़ों को हटाते ही मम्मी का चेहरा फ्रेश, ताजा दिखने लगता था। दिन वाले पटना के वातावरण को चुराकर मैं अपने गाँव ले जाना चाहता था।
किंतु उस रात वाला पटना बहुत डरावना था मुझे हर जगह लाश नज़र आ रहे थे। मेरे उम्र के बच्चे एक लाश की तरह दिख रहे थे जो नशा करके इधर उधर गिर रहे थे। पटना में जिन लड़कियों के हाथों में मैंने कलम देखा था उनके हाथों में सिगरेट सुलग रहे थे। जिन महिलाओं को मैंने गाँव में अब तक केवल बीड़ी से अपने कलेजा गलाते हुए देखा था वो ‘गाँजा’ जैसे नशीले पदार्थ का सेवन कर रहीं थी। उसी रात मुझे ‘सलूशन’ शब्द भी गाड़ी ड्राइवर से सुनने को मिला था। उन्होंने बताया था वो सबसे सस्ता और ज़िन्दगी के लिए महँगा नशा है। मेरे ही उम्र के एक लड़के का पीछा करते करते मैं महावीर मंदर के नज़दीक किसी गली में पहुँचा था। जहाँ देखा कि पचास रुपए के पैकेट बनाकर नशीले पदार्थ बेख़ौफ़ आज़ादी से बेचे जा रहे थे, जिसके खरीददार ज्यादातर युवा ही थे।
इन दिनों मैं अपने गाँव और आस पास के गाँव में युवाओं के मुख से एक नए नशे के पदार्थ का नाम सुनता हूँ जिसे जसे वे- “कोटा” बोलते हैं और सिगरेट में भरकर पीते है। मैंने अब तक देखा नहीं है लेकिन मेरा ख्याल है क यह कोई बहुत जहरीला ड्रग्स है। इस तरह के नशे का टापू हर गाँव में बन चुका है या बन रहा है। इसके दुष्ट प्रभाव के चपेट में कई गाँव के बच्चे आ चुके हैं । ताड़ी गद्दी की तरह हर गाँव में युवाओं के रगों में जहर घोलने के लिए ‘नशा का टापू’ बनाया जा रहा है और ये बहुत तेज़ी से बनाया जा रहा है।
पिछले साल 2025 के छठ में मैं इसके (कोटा) सेवन करने वाले एक व्यक्ति से “देसरी रेलवे स्टेशन” पर मिला था। जब मैंने उनसे यह सवाल किया कि यदि एक दिन आप कोटा का सेवन न करें तो क्या होगा? उनका जवाब बहुत डराने वाला था । उन्होंने बताया एक दिन भी कोटा ना लेने से उनके शरीर में कंपकंपी होने लगती है, वह साबुन चप्पल कुछ भी खाने लगते हैं । उन्होंने कहा- ‘मैं अपने वश में नहीं रहता, कोटा पाने के लिए मैं किसी की हत्या भी कर सकता हूँ।’ इसे अभी न रोका गया तो बचे हुए युवा भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। ऐसा नहीं कि केवल अनपढ़ इंसान इसका सेवन कर रहे बल्कि हर धर्म, हर जाति के पढ़े लिखे और बेरोजगार युवा सभी इसका सेवन आज़ादी से कर रहे हैं। आठ साल से लेकर पैंतीस साल के व्यक्ति इसका ज़्यादा सेवन कर रहे हैं। जो आज आठ साल के हैं वही कल फिर पैंतीस के होंगे और शायद पचास के हो न पाए।
पिछले एक साल से मैं पटना के “कोइरी टोला, कुशवाहा चौक गायघाट” नामक जगह पर रह रहा हूँ।यहाँ छोटे बच्चों के बीच एक प्राइमरी नशा फैलाने का काम किया जा रहा है। वह नशा मोबाइल के रूप में फैलाया जा रहा है। कुछ लोग बीस-पच्चीस मोबाइल फ़ोन रखकर इसे व्यवसाय की तरह चला रहे हैं। एक घंटे का पंद्रह से पच्चीस रुपये लेते हैं और बच्चों को फ़ोन चलाने के लिए देते हैं। उन बच्चों को मैंने गेम खेलते और पोर्न (अश्लील) वीडियो देखते हुए देखा है। उन बच्चों के मुख में चॉकलेट नहीं गुटका होता है।उन्हीं बच्चों को शाम में मैं पैसों के लिए चाऊमीन दुकान पर या किसी और दुकान पर प्लेटें धोते हुए देखता हूँ। एक बस्ती बसी है मेरे रूम से कुछ दूरी पर उसे देखकर बहुत बुरा लगता है। गर्मियों में देखता था उनका आधा शरीर उनके घर के अंदर और आधा सड़कों पर होता था। गंदगी इतना ज़्यादा कि मानो डेंगू के मच्छरों ने अपने नाम पर वह जगह रजिस्टर करा रखी हो। यह तय है कि वहाँ के बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल रही होंगी । राजधानी पटना में होने के बावजूद हो सकता है उस बस्ती में रहने वाले बच्चों ने स्कूल का मुँह नहीं देखा हो। कई बार शाम में उस तरफ़ गया हूँ तो नशे में लोग डूबे रहते दिखे हैं । गाय घाट में ही गंगा किनारे घाट पर शाम में नशा के लिए युवाओं का मेला लगा रहता है।
हवाओं में गाँजा की महक इतनी घुल चुकी होता है कि साँस लेते समय मालूम होता है जैसे हम स्वयं नशा कर रहे हों। बिहार में कहने को दारू बंद है और यह सच्चाई सबको पता है। पटना में ही एक दारू विक्रेता ने एक दिन गलती से मुझे कोई और समझ कर मेरे हाथों में दारू थमा दया था, जब उसने मेरा चेहरा देखा तो सॉरी बोलते हुए वापस ले लिया। मुझे लगता है युवा न केवल नशा कर रहे बल्कि अधिक पैसों के लालच में नशा का व्यापार करने की तरफ़ भी आकर्षित हो रहे हैं। बिहार के अलग अलग गाँव में आप स्वयं ठहर कर देख सकते हैं कि शाम होते ही युवाओं की टोली नशा के टापू पर आपको जाते हुए दिख जाएँगी।
मैंने एक और चीज़ नोटिस की है कि नशे के बाद उनकी काम वासना शायद बहुत बढ़ जाती है। पटना में भी नशा किए टेम्पो चालकों से मैं कई बार ऐसी बातें सुन चुका हूँ जिसे सुनकर मुझे शर्म आ जाती है। पटना में ही कुछ महीने पहले एक युवती ने बताया कि रात में यहाँ सड़कों पर चलने से डर लगता है। जब लड़कियाँ लाइब्रेरी से अपने रूम पर जाती हैं तो नशे में डूबे लोग उनकी ओर भूखे भेड़िए की तरह देखते हैं और कई बार उनके शरीर के प्राइवेट हिस्से पर हाथ भी लगाते हैं। मुझे लगता है पटना का गायघाट भी इस राजधानी में सस्ते नशे का बसा हुआ जीवन मृत्यु के बीच का एक ख़तरनाक टापू है। इसे जल्द से जल्द न उजाड़ा गया तो यह राक्षस तैयार करने की फैक्ट्री भी बन सकता है। उसी तरह गाँव के टापू को भी नष्ट करके युवाओं को बचाना होगा वरना जो लाश मैंने पटना जंक्शन पर एक रात देखी थी , वह लाश घर घर की आम कहानी हो जाएगी….

