जीवन का प्रवाह कितना सुंदर होता है। एक नदी की तरह। नदी के प्रवाह को कोई नाम नहीं दिया जा सकता। उसे समेटा नहीं जा सकता। नदी किसी एक की नहीं। किसी की नहीं। सब की है। सब की मतलब हर एक की है। नदी को किसी की पहचान से कोई लेना-देना नहीं। उसकी धारा में, उसके प्रवाह में सभी पहचान विलीन हो जाते हैं। नदी नदी है। वह ठहरती नहीं। किसी के लिए नहीं । रोकने की, उसकी धारा को मोड़ने की, उसकी विशालता को समेटने की मूर्खता मनुष्य ने की है। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि दुनिया में सबसे शुरुआती उदाहरण मनुष्य द्वारा सर्वप्रथम नदी के प्रवाह को कृतिम रूप से मोड़ने की कोशिश का मेसोपोटामिया क्षेत्र (आधुनिक इराक) में लगभग 4000 ईसा पूर्व के आसपास का है । उस समय फरात और दजला नदियों के जल को सिंचाई के उद्देश्य से नहरों के माध्यम से नियंत्रित और परिवर्तित किया जाता था। आधुनिक दौर में इसका उदाहरण सर्वप्रथम 1900 ईस्वी में संयुक्त राज्य अमेरिका में शिकागो नदी की धारा को कृत्रिम रूप से पूरी तरह से मोड़ने का मिलता है जो इसके प्रदूषित पानी को मिशिगन झील में जाने से रोकने के लिए किया गया था । फिर अपने स्वार्थ के लिए आधुनिकता के कंधे पर सवार मनुष्य ने इसे अपनी विजय माना और अपनी जीत के अहंकार पर सवार किसी न किसी बहाने वह नदी के साथ मनमानी करता रहा, और आज भी कर रहा है ।भारत में भी नदियों के साथ छेड़-छाड़ बड़े पैमाने पर होता रहा है। औपनिवेशिक काल में इसकी शुरुआत हो चुकी थी। आज यह अपने चरम पर नज़र आ रही। अनगिनत बहानों से नदियों के प्रवाह को असहज बनाया जा रहा है।
नदी किसी कंपनी की नहीं। किसी व्यक्ति, समुदाय या धर्म की नहीं। प्रत्येक जीव की है। नदी का रिश्ता किसी एक धर्म से भी नहीं। सजीव हो या निर्जीव- प्रकृति के हर एक कण से नदी का रिश्ता है, और प्रत्येक कण का नदी से। अपनी जीवन यात्रा में एक मनुष्य से लेकर, एक जीव, एक पत्थर, एक बालू का कण, चाहे हम जिसे उठा लें, हर एक की जीवन यात्रा में नदी की भूमिका है। लोक जीवन का स्पंदन है नदी। नदी का सांप्रदायिकरण कुछ ऐसा है जैसे कि हमारी साँस का सांप्रदायिकरण कर दिया जाये। साँस लेने की प्रक्रिया को नहीं कह सकते कि वह किसी एक धर्म, जाति अथवा समुदाय की है। किसी एक देश के लोग ही साँस ले सकते हैं या फिर किसी वर्ग विशेष के अधिकार में ही है साँस लेना या फिर फ़लाँ व्यक्ति यहाँ साँस ले सकता है, वहाँ नहीं – ऐसा नहीं हो सकता कि साँस लेने का भी अधिकार क्षेत्र हो ! हम जीवन को इतने विकृत रूप में नहीं बाँट सकते।उसी तरह नदी के बहाव, नदी के पानी पर, नदी से रिश्ता बनाने, उसके समीप जाने का अधिकार किसी एक जाति या धर्म या फिर वर्ग विशेष का हो सकता है क्या?
खबर आई है कि 2027 के अर्ध कुंभ के दौरान हरिद्वार में 105 घाटों में ग़ैर हिंदुओं के आगमन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा । हालाँकि इसकी अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। मगर तक़रीबन दो -ढाई महीने पहले ही हरिद्वार में कुछ जगहों पर बोर्ड लगाया गया, जिस पर लिखा है – ‘अहिन्दू प्रवेश निषेध क्षेत्र, आज्ञा से -म्युनिसिपल एक्ट, हरिद्वार’। किसी संस्था, संगठन या पार्टी का नाम नहीं लिखा है बोर्ड पर। गंगा सभा ने 1916 में बने म्युनिसिपल एक्ट का हवाला दिया और इस माँग को उठाया है। हालाँकि प्रशासन की ओर से यह कहा गया कि उन्हें इसकी कोई सूचना नहीं, ना ही ऐसा कोई बोर्ड लगाने का निर्देश इन्हें दिया गया है। खबर यह भी आई कि हड़की पौरी पर लोगों के आधार कार्ड तक चेक किए गए उनके धर्म जानने के लिए। जनवरी के महीने में आई यह खबर हमारे सामने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न के साथ साथ ऐसे धार्मिक अवसरों के विस्तार को भी स्पष्टता से सोचने पर बाध्य करती है। कुंभ, अर्धकुंभ या महाकुंभ का सिर्फ़ धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ भी है। यह महज़ किसी एक धर्म के कर्म-कांड का हिस्सा नहीं है। यह कहना या मानना सर्वथा अनुचित है कि कुंभ में स्नान या कुंभ में सिर्फ़ हिंदू धर्म के लोग ही जाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि कुंभ के दौरान आने वाले लोगों में प्रधानता हिंदू धर्म के लोगों की ही होती है। मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह एक सामाजिक व सांस्कृतिक अवसर की तरह है जिसमें कई जाति, कई धर्म, कई देश के लोग सम्मिलित होते हैं। इस नाते यह एक बड़े आर्थिक आय के श्रोत का भी मध्यम है। हरिद्वार और ऋषिकेश दोनों ही पर्यटन स्थल हैं। जहां वर्षों से विभिन्न देशों से विभिन्न धर्मों के लोग आते रहे हैं और गंगा में स्नान भी करते रहे हैं।
ऐसे में 105 घाटों पर ग़ैर हिंदुओं का प्रतिबंध क्या उचित होगा ? कुंभ के दौरान संगम होता है विभिन्न संस्कृतियों का एक संस्कृति में। कुंभ के लिए आदर का भाव और उत्साह हमेशा से देखा जाता रहा है देश के ग़ैर हिंदू समुदायों में भी और विदेश के लोगों में भी। हर किसी की उत्सुकता का विषय होता है। लाखों लोगों का नदी में स्नान करना सिर्फ़ धार्मिक रूप में ही नहीं बल्कि विश्व को बांधने वाली बंधुत्व ऊर्जा की भी मिसाल है। ऐसे पावन और विश्व बंधुत्व के अवसर पर नदी में सिर्फ़ किसी एक धर्म के लोगों को स्नान की अनुमति देना क्या उचित है? यकीनन यह हिंदू धर्म का पवित्र अवसर है, मगर हम कैसे यह भूल सकते हैं कि कुंभ ने समय के साथ अपना सामाजिक और वैश्विक विस्तार किया है जिसमें सभी धर्मों और जातियों का समागम शामिल है।
हरिद्वार और ऋषिकेश में बहने वाली गंगा विशिष्ट क्यों है और क्या इसकी विशिष्टता किसी विशेष धर्म तक सीमित होती है? कुंभ का एक धार्मिक महत्व है। मगर यही धार्मिक महत्व जब प्राकृतिक महत्व से मिलकर इस आयोजन को विशष्ट और ‘लार्जर देन ए रिलिजन’ बना देता है। जिसे हम मानवीय धर्म कह सकते हैं, जिसे हम मनुष्य में ईश्वरीय चेतना या उच्चतम चेतना का प्रवाह कह सकते हैं। महर्षि श्री अरविंद ने संपूर्ण योग के अपने दर्शन में इसी की महत्ता का बार-बार ज़िक्र किया है , जहां वह चेतना को एकत्व का, हर तरह के एकत्व का माध्यम बनाते हुए योग के माध्यम से मनुष्य चेतना को इतनी उच्च अवस्था में ले जाने की बात करते हैं जहां धर्म, जाति , संप्रदाय, देश आदि का भेद मिट जाता है। श्री अरविंद की आध्यात्मिक सखा मीरा अल्फ़ासा (श्री माँ) ने तो इसे बार-बार स्पष्ट किया है। वे कहती हैं- “सत्य न तो अलगाव में है और न ही एकरूपता में। सत्य विविधता के माध्यम से प्रकट होने वाली एकता में है।” “The truth is neither in separation nor in uniformity. The truth is in unity manifesting through diversity”. आज धर्म के नाम पर यह उचित अनुचित का प्रश्न उठ रहा, कल हो सकता है, या क्या पता अगले कुंभ में हमारी सामूहिक चेतना इतनी सुसुप्त हो जाए कि हम यह सुनने और मनाने को तैयार हो जायें कि फ़लाँ जाति के लोग ही 105 घाटों पर स्नान करेंगे शेष के लिए प्रतिबंधित होगा। हम किन-किन स्तरों पर बाँटेंगे और बँटेंगे ? कहाँ-कहाँ और कितना लड़ेंगे? क्या सिर्फ़ नफ़रत की लड़ाई लड़ना हमारा जीवन रह गया है?
पहले हमने नदी की देह को, उसकी विशाल उपस्थिति को समेटने की कोशिश की, फिर उसकी विशालता के शरीर ही नहीं उसकी आत्मा जो लोक जीवन का आधार रही है , उससे जुड़े जीवन मूल्यों को ही ख़त्म कर देने का प्रयास कर रहे। नदी, पहाड़ हो या फिर चाहे प्रकृति का एक कण ही क्यों ना हो वह लोक जीवन से जुड़ा है, उसके सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ लोक जीवन से जुड़े हैं । लोक जीवन को नष्ट ही इस आधार पर किया जाता रहा ताकि लोक जीवन के प्रवाह से निकल कर आने वाले मानवीय और नैतिक गुणों को नष्ट किया जा सके।लोक जीवन में एकता और अखंडता निहित है। मध्यम वर्ग के निर्माण ने लोक जीवन को ,उसके मूल्यों को, एकता और अखंडता को नष्ट किया है। । ‘सामाजिक’ शब्द संकुचित होता गया मध्यम वर्ग के विकास के साथ-साथ। मध्यम वर्ग के निर्माण की आर्थिक पृष्ठभूमि की रचना ही ऐसी हुई कि वह हद से ज़्यादा सेल्फ-सेंटर्ड (स्व-केंद्रित) बन सकें, जहां उसे अपने या अपने परिवार के अलावा दूसरे किसी से कोई मतलब नहीं रहे । मध्यम वर्ग ने एक मानसिक मनोवृत्ति की संरचना की । जिसे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने स्वयं के अर्थोपार्जन, स्वयं के विकास से मतलब रहा। मध्यम वर्ग का निर्माण सिर्फ़ मध्यम वर्ग आर्थिक रूप से विकसित करना नहीं था, बल्कि मध्यम वर्ग एक सोच के रूप में विकसित हुआ , जिसने सभी वर्ग – निम्न से निम्न वर्ग को बाज़ार के प्रभाव के साथ मिलकर मध्यम वर्ग की प्रवृति से ग्रसित कर दिया। उसके साथ ही प्रकृति का दोहन, प्रकृति से अलगाव, प्रकृति से दूरी बढ़ती गई। हर कोई प्रकृति पर किसी ना किसी रूप में क़ब्ज़ा करने को लालायित है। प्रकृति के हर एक कण से मानव जीवन का, लोक जीवन का जो रिश्ता था, जो प्रतीक रूप में हम सब के भीतर मानवीय गुणों का संचार कर रहा था, जो एकत्व की भावना थी- वह सब धीरे-धीरे जाती रही।
और आज लोक मस्तिष्क जैसा कुछ नहीं। आज भीड़ है। भीड़ के पास अपना विवेक नहीं होता। उत्तेजना होती है। एकत्व की भावना भीड़ चेतना से नहीं आती -किसी विषय या समस्या पर एक मत होने से क्षणिक एकत्व की भावना उत्पन होती है, जिसे तोड़ने में ज़्यादा समय नहीं लगता। उसका बिखरना तय होता है। एकत्व की भावना का विकसित होना जीवन का हिस्सा है। वह बोध कहीं बाहर से नहीं आती। प्रकृति से हम जितना कटेंगे उतना ही हम मानवीय संबंधों से भी दूर होंगे। उतना ही विघटन का भाव हावी होगा जीवन पर।इतिहास इसका साक्षी है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी काबुलीवाला पर आधारित फ़िल्म का एक गीत इस पूरे भाव को समेट लेता है—
यह वह गीत है जो बार-बार हृदय को स्पर्श कर चेतना को जागृत करने का काम करता रहा है। रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी काबुलीवाला पर आधारित फ़िल्म ‘काबुलीवाला’(1961) का यह गीत है जिसे संगीत में पिरोया सलिल चौधरी ने है, हेमंत कुमार ने गाया है और लिखा है गुलज़ार ने है । यह गीत वह सब कुछ कह देता है जो यह लेख कहना चाहता है –
गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे
लहराये पानी में ऐसे जैसे धूप-छाँव रे।
रात कारी दिन उजियारा मिल गये दोनों साये
साँझ ने देखो रंग रुप के कैसे भेद मिटाये
लहराये पानी में जैसे धूप-छँव रे …
नाम कोई बोली कोई, लाखों रूप और चेहरे
खोल के देखे प्यार की आँखें, सब तेरे सब मेरे रे
लहराये पानी में जैसे धूप छाँव रे
काँच कोई माटी कोई रंग-बिरंगे प्याले
प्यास लगे तो एक बराबर जिसमें पानी डाले रे
लहराये पानी में ऐसे जैसे धूप छाँव रे


बहुत ही अच्छे विचार के साथ प्रस्तुति की गई । विश्व बंधुत्व ही हमारी संस्कृति सही मायने में घनीभूत करता है । सार्वभौमिक रूप से इसका सही पालन ही इसकी जड़ों को मजबूती प्रदान करता है .. but when it is selectively applied, it loses its basic purpose. See in some religion they totally deny access to the people of other religions and they do create utter disturbances in hindu religious activities in various forms . Such problems need to be addressed first by awakening such mind sets incase we truely wants to instill that विश्व बंधुत्व भावना & to have a unified & enriched culture !
बहुत ही अच्छे विचार के साथ प्रस्तुति की गई । विश्व बंधुत्व ही हमारी संस्कृति सही मायने में घनीभूत करता है । सार्वभौमिक रूप से इसका सही पालन ही इसकी जड़ों को मजबूती प्रदान करता है .. but when it is selectively applied, it loses its basic purpose. See in some religion they totally deny access to the people of other religions and they do create utter disturbances in hindu religious activities in various forms . Such problems need to be addressed first by awakening such mind sets incase we truely wants to instill that विश्व बंधुत्व भावना & to have a unified & enriched culture !