इतने दल, इतने नेता पर….

इतने दल, इतने नेता पर उन्नति का अभियान रुका है,
गुमसुम हैं आकाश-दिशाएँ, फिर भी क्यों तूफ़ान रुका है?

(1)
गया नहीं क्यों तम जीवन से
दूर अभी भी सुख निर्धन से
भारत की अब जनता पूछो सुख का कहाँ विहान रुका है?
गुमसुम हैं आकाश-दिशाएँ, फिर भी क्यों तूफ़ान रुका है?

(2)
लूट-पाट हत्या, बर्बादी
तोड़-फोड़ की है आज़ादी
जीवन नहीं सुरक्षित इक पल, प्राणों का सम्मान रुका है,
गुमसुम हैं आकाश-दिशाएँ, फिर भी क्यों तूफ़ान रुका है?

(3)
प्रजातंत्र की पहरेदारी
करनेवाले भ्रष्टाचारी
इन्हें दंड देने का अब तक आया नहीं, विधान रुका है,
गुमसुम हैं आकाश-दिशाएँ, फिर भी क्यों तूफ़ान रुका है?

(4)
न्याय करें क्या, हैं जन-शोकक
सिंहासन पर चढ़े विदूषक
आहें आग न बन पाती क्यों, क्यों आहत अभिमान रुका है?
गुमसुम हैं आकाश-दिशाएँ, फिर भी क्यों तूफ़ान रुका है?

(5)
आओ, सिंहनाद करें हम
उजड़ा घर आबाद करें हम
नेताओं को छुट्टी दे दें, इनसे ही निर्माण रूका है,
गुमसुम हैं आकाश-दिशाएँ, फिर भी क्यों तूफ़ान रुका है?


परिचय
हिन्दी के प्रसिद्ध कवि कथाकार व आलोचक