Original Writing : Avijit Pathak ll Hindi Translation : Shephali
अंधेरे समय का यह दौर। जब विषाक्त और साधनवादी राजनीति हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गई हैं। सूचना प्रदूषण का भारी बोझ हर चीज के सौंदर्य को विद्रूप कर, असुंदर बना उसे विकृत रूप में पेश कर रहा, उसके सौंदर्य को बदल रहा, ऐसे में ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को समझना आसान नहीं है। सत्ताधारी शासन और उसकी प्रचार मशीनरी कन्याकुमारी से कश्मीर तक की इस यात्रा को नकार सकती है, उसे उपहास का विषय बना सकती है और इस पूरी यात्रा की महता को गपशप में बदल सकती है—जैसे राहुल गांधी की यात्रा के दौरान उनके द्वारा पहनी जाने वाली टी-शर्ट की कीमत, या उस कंटेनर की ‘पाँच सितारा’ सुविधाएँ जिसमें वे सोते और आराम करते हैं। स्मृति ईरानी और संबित पात्रा जैसे लोग इस कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यात्रा को कमतर दिखाने के लिए झूठे और भड़काऊ बयान देने में यकीनन हिचकिचाएँगे नहीं। इसके अतिरिक्त, ऐसे सनकी और राजनीतिक टिप्पणीकार भी हैं जो इसे पूरी तरह से उपयोगितावादी पैमाने पर आँकते हैं—कि क्या यह यात्रा कांग्रेस को चुनावी लाभ पहुँचा पाएगी, विशेषकर तब जब मोदी की ‘जीवन से बड़ी’ छवि या अमित शाह की चुनाव जीतने वाली मशीनरी अजेय प्रतीत हो रही हो।
फिर भी, इस शोरगुल के बीच 3,570 किलोमीटर लंबी यात्रा के प्रतीक और संभावनाओं के महत्त्व को समझना ज़रूरी है।चलना सिर्फ़ चलना नहीं होता। उसका अपना सौंदर्य और दर्शन होता है।मानव इतिहास भरा पड़ा है चलने की यात्रा से। यात्री, तीर्थयात्री, संत, सूफी और आम लोग चलते रहे हैं। और हमारी अपनी राजनीतिक परंपरा बताती है कि महात्मा गांधी चलते रहे, चलते रहे, अन्वरत चलते रहे। ठीक इसके विपरीत अमीरों और शक्तिशाली लोगों की आवाजाही को हम देखें तो पायेंगे कि राजनेता, उद्योगपति और सेलिब्रिटी आप और हम जैसे आम लोगों के ‘दूषित’ संपर्क से बचने के लिए चार्टर्ड विमान का इस्तेमाल करते हैं; या फिर विधायक, सांसद और मंत्रियों की कारें/सरकारी गाड़ियाँ तेज़ी से दौड़ती हैं सड़कों पर — खुले और ऊँचे स्वर में नंगी ताक़त का प्रदर्शन करती हुईं, पुलिस के हस्तक्षेप से आम लोगों की आवाजाही बाधित करती हुई ।
लेकिन सचेतन पदयात्रा अलगाव का अनुभव बनने के बजाय राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर पर एक उपचारात्मक प्रक्रिया साबित हो सकती है। ऐसी यात्रायें सिर्फ़ हमारी आँखें ही नहीं खोलती हैं बल्कि हमारे क्षितिज का विस्तार भी करती हैं । हमें रोज़मर्रा की ज़िंदगी के बीच ले जाती हैं , जो हमें लोगों की ज़िंदगी को क़रीब से देखने समझने में सक्षम बनाती हैं । कल्पना कीजिए , आप मुंबई की मरीन ड्राइव पर चल रहे हैं। बेशक, आप अरब सागर की लहरों के उतार- चढ़ाव को देखते हैं; मलाबार हिल्स और वहाँ की भव्य गगनचुंबी इमारतों की चमक देखते हैं। इन सब के अलावा आप कुछ और भी देखते हैं- आप गोरखपुर से आए एक व्यक्ति को देखते हैं जो भेलपुरी बेच रहा है और भेलपूरी चखने के लिए वह आपसे आग्रह कर रहा है। आप एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति को देखते हैं जो ताली बजाते, मुस्कुराते हुए आपके साथ चल रहा है। आप कॉलेज के छात्रों को देखते हैं — घूमते हुए, हँसते हुए, रोते हुए, रिश्ते सँजोते हुए और चुटकुले सुनाते हुए।आप भिखारियों, फेरीवाले, रेहड़ी-पटरी पर समान बेचने वाले उन लोगों को देखते हैं जिनके सपने कहीं खो से गए हैं। दूसरे शब्दों में, हम देखते हैं- आशाएँ और सपने, संघर्ष और कष्ट, चकित कर देने वाली संपन्नता और महज़ जीवित रहने के लिए रोज़मर्रे की जद्दोजहद।
चलना जोड़ता है, धरती से जोड़े रखता है और आत्ममोह (narcissism) के बीजों को मिटा देता है। अफ़सोस की बात है कि हमारे ज़्यादातर राजनेता और अफ़सरशाह चलते नहीं हैं। भयभीत और अलग-थलग प्राणी के रूप में वे केवल एक ही प्रकार की शक्ति को साधते हैं — वह शक्ति जो अलगाव पैदा करती है और दूरी बढ़ाती है। वे प्रेम और सहानुभूति की शक्ति से अनभिज्ञ रहते हैं — वह शक्ति जो जोड़ती है।
और इस तरह ध्यानमग्न चलने में चाहे वह शारीरिक हो या रूपकात्मक वह हमें आत्म-अन्वेषण की ओर मुखर करता है अथवा किसी संस्कृति अथवा सभ्यता को जानने समझने, उसे खोजने की निरंतर प्रक्रिया की ओर ले जाता है। यदि महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद जो यात्रा की थी, वह उन्होंने नहीं की होती, तो उनके लिए पराजित/औपनिवेशित राष्ट्र के दर्द को समझना संभव नहीं होता। और बग़ैर उस दर्द और असमानता को समझे बिना वह भारत के नैतिक और राजनीतिक कल्पनाशीलता को स्वराज के संघर्ष के लिए जाग्रत नहीं कर पाते।एक अलग ढंग से, अपनी बौद्धिक यात्रा के माध्यम से जवाहरलाल नेहरू ने भारत को खोजा ‘भारत एक खोज’ के रूप में , जहां वह प्राचीन सभ्यता की कथाओं के माध्यम से नए युग के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश करते नज़र आते हैं। । वस्तुतः यात्रा में निहित यह संभावना लोगों को आकर्षित करती रही है — विनोबा भावे से लेकर बाबा आमटे तक।
आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, ज़रा उसके बारे में सोच कर देखें। भ्रातृत्व की भावना नहीं है ।क्योंकि अब तक हम जातिगत ग़ैरबरबारी और पितृसत्तात्मक हिंसा से लड़ नहीं पाए हैं। साथ ही, जिस तरह के अति-राष्ट्रवाद को सत्तारूढ़ दल ने सामान्य बनाने की कोशिश की है, उसने हमें एक करने के बजाय हमारे बीच अलगाव की दीवारें खड़ी कर दी हैं, हमारी चेतना को घेरों में बाँध दिया है। मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को ‘अन्य’ ठहराने के कार्य के माध्यम से देश को मानसिक और सांस्कृतिक रूप से विभाजित कर दिया है। इसी तरह, नवउदारवाद के मंत्र ने गरीबों, किसानों और मज़दूर वर्ग को और भी हाशिये पर धकेल दिया है।
जहाँ एक ओर लुभावने उपभोक्तावाद की कथाएँ और चुनिंदा अरबपतियों, क्रिकेट और बॉलीवुड सितारों की ‘सफलता की कहानियाँ’ नए मध्यवर्ग को आकर्षित करती हैं और मॉल/मल्टीप्लेक्स/भव्य गेटेड कॉलोनियों का निर्माण करती हैं, वहीं हमारी अधिकांश जनता भीड़भाड़ वाली झुग्गियों, अस्वच्छ निम्न-मध्यवर्गीय बस्तियों और सड़कों व रेलवे स्टेशनों पर जीवन बिताती हैं । एक मायने में, भारत सचमुच घायल और विभाजित है।
इसलिए, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ एक ताज़गी भरा बदलाव प्रतीत हो रही है ।
राहुल गांधी और इस यात्रा में भाग ले रहे सभी लोग जब पैदल चलते हुए गाँव-गाँव और कस्बों से गुज़रते हैं, साधारण लोगों से मिलते हैं और उनकी कहानियाँ सुनते हैं, तो मुझे महसूस होता है कि यह एक शुरुआत है। संभवतः इससे उन्हें नेहरू-गांधी परिवार में जन्म लेने के विशेषाधिकार से परे स्वयं को देखने, ‘पार्ट टाइम’ कार्यकर्ता कहे जाने के कलंक को पार करने, और जैसा कि मैं आशा करता हूँ — सहानुभूति, करुणा और सुनने की कला की शक्ति को समझने में सक्षम बनाएगा। और वे सब — नागरिक समाज के कार्यकर्ता, जनबुद्धिजीवी और साधारण लोग, जो उनके साथ चल रहे हैं, मेरा विश्वास है कि वे हमें वह देंगे जिसकी आज हमें सबसे अधिक ज़रूरत है — अपनी शक्ति को पुनः प्राप्त करने का साहस, अपनी आवाज़ को अभिव्यक्त करने का बल, और अपने-अपने ढंग से इस बुरी तरह बँटे हुए देश को जोड़ने और एक करने का प्रयत्न।
भले ही यह यात्रा किसी चुनावी लाभ तक न ले जाए, पर यह एक उत्प्रेरक साबित हो सकती है। आखिरकार यह हमें भय से मुक्त होने के लिए आह्वान जो करती है।
(अभिजीत पाठक एक समाजशास्त्री, शिक्षाविद् और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोशल सिस्टम्स के पूर्व प्रोफेसर हैं। साभार: द ट्रिब्यून। अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवादित शेफाली के द्वारा)


यह आलेख संभवतः चल रही यात्रा के दौरान लिखा गया था। अब तो इस यात्रा के अगले पड़ावो और आभासी परिदृश्य की छाया दिखने लगी है।
हिंदी में आलेख प्रस्तुत करने केलिए बधाई एवं धन्यवाद ।