पृथ्वी इतनी सुंदर क्यों है आज भी?
प्रश्न बहुत साधारण है।
इस सुंदरता का अर्थ सिर्फ़ बाहरी नहीं। एक अंतस यात्रा से होकर गुजरना होगा इस प्रश्न से उत्तर तक पहुँचने के लिए। एक नहीं कई अंतर यात्रा करनी होगी हमें। आज इस प्रश्न के उत्तर को तलाशते हुए हम ऐसी ही एक अंतस यात्रा पर चलते हैं।
इस यात्रा में एक शिक्षक हैं और सहयात्री के रूप में उनके छात्र। इस अन्तर यात्रा की शुरुआत जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की सड़कों से शुरू होकर, अरावली की पहाड़ियों, विश्वविद्यालय के फूल-पंछी, कक्षाओं, सिद्धांतों, जीवन से गुजरती हुई थमती है उन दो आँखों पर, जिनमें पृथ्वी के सौंदर्य का राज़ छुपा मिलता है।
शिक्षक हैं प्रोफेसर अभिजीत पाठक जी। और अनेक छात्र। अनेक छात्र में एक इस यात्रा की कथा वाचक भी। कथा वाचक के निज अनुभव भी इस यात्रा का हिस्सा हैं, जिन्हें इससे आपत्ति होगी, उम्मीद है प्रोफेसर अभिजीत पाठक के पढ़ाने की शैली से होकर गुजरने के बाद पाठक यह अच्छी तरह समझ पायेंगे कि निज अनुभव क्यों, कैसे, कहाँ और कब महत्वपूर्ण होता है।
कथावाचक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की सड़क के किनारे अमलतास के फूलों से लदे Golden Tree के नीचे खड़ा दूर क्षितिज की ओर बाहें फैलाए सड़कों को शून्य में डूबे देख रहा है…
जेएनयू की सड़कें, आभार तुम्हारा !
बहुत प्रिय हैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की वो घुमावदार सड़कें। जहां से एक नहीं सहस्र या फिर अनगिनत रास्ते फुट पड़ते थे। उन सड़कों पर हमने कई प्रेम को परवान चढ़ते देखा है। उन्हीं सड़कों को हमने विरह की भी यात्रा पर जाते देखा है। उन्हीं सड़कों पर दुनिया भर के तमाम सिद्धांतों को गपियाते सुना है। और ये वही सड़कें हैं जिन पर सिद्धान्त और व्यवहार के बीच होते उत्तेजित संवादों को भी सुना है हमने । इन्हीं सड़कों से निकलने वाले रास्तों को अध्यात्म की ओर जाते देखा है। मौन से महा मौन की यात्रा पर अकेले अज्ञात की ओर बढ़ते कदमों को महसूस किया है इन सड़कों पर मैंने। इन्हीं सड़कों से क्रांति की कई धाराओं को फुट पड़ते भी देखा है। हर धारा अपना रास्ता चुनने की स्वतंत्रता रखती थीं ।

अनगिनत कदमों के निशां हैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की सड़कों से निकलने वाले रास्तों पर। कुछ जाने पहचाने तो अनगिनत अनजाने। इन्हीं सड़कों से फूट पड़ने वाले रास्तों पर चलते चलते कुछ लोगों को जेएनयू के छात्र से जेएनयू के शिक्षक बनने का सौभाग्य मिलता रहा है। उन कुछ सौभाग्यशालियों में प्रोफेसर अभिजीत पाठक भी हैं।पहले पहल मेरी पहचान उनसे इन्हीं सड़कों के माध्यम से हुई। इन सड़कों से यारी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ने-पढ़ाने वाले ज़्यादातर छात्रों-शिक्षकों की रही है। सर और मैं उनमें से एक थे। मेरे लिए तो हर सवाल का जवाब ये रिंग रोड की सड़कें थीं। इन्हीं पर चलते चलते मेरा संवाद गांधी, मार्क्स, निकोला टेस्ला, टैगोर, डेविड ह्यूम, एरिक फ़ॉर्म, रेणु, विवेकानंद, ब्रह्मदेव शर्मा, पाश, कांत, नीत्शे, बेंजामिन, पिकासो, अमृता शेरगिल…ऐसे ना जाने कितने ही अनेक विद्वत् जनों से हुआ है। मैंने विद्वत् जनों को उनकी किताबों से कहीं ज़्यादा उनसे होने वाले संवादों से जाना है। जेएनयू की रिंग रोड की उन सड़कों पर जैसे आपको सब मिल जाएँगे। आप जिससे संवाद करना चाहें वह उपस्थित हो जाते हैं आपके लिए। विनम्रता क्या होती है , यह मैंने जेएनयू के रिंग रोड की इन सड़कों से भी जाना है। मैंने समय से संवाद किया है इन सड़कों के माध्यम से। हाँ, वर्तमान को भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए इतिहास से संवाद किया है मैंने इन्हीं सड़कों की मध्यम से।
ऐसे ही चलते चलते एक संवाद इन सड़कों के माध्यम से प्रोफेसर अभिजीत पाठक सर से भी हुआ। सर अक्सर दिख जाते थे इन सड़कों पर। कभी अकेले। कभी अपनी बेटी अनन्या, और अपनी संगिनी नूतन जी के साथ। अक्सर वह नज़र आते नूतन मैडम के साथ। और कभी कभी अपने किसी छात्र के साथ भी।
सर से मेरा कोई पूर्व परिचय नहीं था।
सर और मैडम से मेरी पहचान इन्हीं सड़कों ने करवाई । और यह पहचान कुछ इस तरह बनी कि एक गहरे आदर और सम्मान के भाव ने इनकी छवि मन में ऐसी बुन दी कि सर और मैडम को साथ देख मन प्रसन्नता से भर जाता। नूतन मैडम की सादगी मेरे मन को बहुत भाती थी। उनके संपूर्ण व्यक्तित्व की सादगी जो उनके पहनावे, उनकी आवाज़, उनकी चाल से प्रकट होती थी…वह किसी देवी के एक साधारण मनुष्य में अवतरित होने की प्रतिमूर्ति से कम मुझे नहीं लगती थीं ।
सर की कक्षा और आत्मविश्वास
सर से मिलने से पहले मैं उनकी एक किताब पढ़ चुकी थी। उनके बारे में, ख़ासकर उनके छात्र जीवन की कई कहानियाँ मैं जेएनयू के अपने से बहुत सीनियर लोगों से सुन चुकी थी। अक्सर मेरा यही सवाल होता ‘कि जब सब यह मानते थे, तो सर ने अकेले ऐसा क्यों स्टैंड लिया। इसका मतलब सर को बहुत भरोसा था अपने ऊपर, अपनी सोच पर। ज़ाहिर है मैं ना तो सर के छात्र जीवन में विश्वविद्यालय में घटने वाली उन घटनाओं से परिचित थी, ना ही उसके संदर्भ से। मुझे बस यही बात अच्छी लगी सभी घटनाओं में कि सर जो कुछ सही मानते थे उस पर खड़े रह सकते थे, चाहे उनके साथ कोई खड़ा हो या नहीं।
सर की कक्षाएँ चेतना सम्पन्न होती थीं। उन दिनों जब पहली बार मैं सर की कक्षा में बैठी, मेरा आत्मविश्वास कुछ हिला सा था। मेरी हर बात परिवार या आस-पास के लोगों द्वारा अव्यवहारिक मान लगभग ऐसे ही ख़ारिज कर दी जाती थी।। कई बार सुनी भी नहीं जाती। अक्सर यही कहा जाता कि ये किताबों की बातें हैं। नहीं, पापा और माँ की तरफ़ से ऐसी कोई बात नहीं की जाती। मगर मेरा आत्मविश्वास कमजोर हो गया था। मैं स्वयं को हमेशा प्रश्न करती मगर फिर भी हर तरह से ख़ुद को परखने के बावजूद मुझे लगता कि नहीं मैं तो जो कह रही वह सबसे व्यवहारिक बात है। ख़ैर! एक रोज़ मैं सर के क्लास में अनुमति ले कर बैठ गई। उन्होंने पढ़ाते वक़्त सूर्योदय और सूर्यास्त के सौंदर्य का वर्णन किया। उसी क्षण मेरा आत्मविश्वास लौट आया। मैंने सोचा – एक इतना बड़ा, विद्वान प्रोफेसर, जिनका सब इतना सम्मान करते हैं, जिन्होंने इतनी अच्छी अच्छी किताबें लिखीं हैं, वे जब किसी पश्चिम के समाजशास्त्र सिद्धान्त को पढ़ाते हुए सूर्योदय और सूर्यास्त की बात कर सकते हैं, तो फिर ना ही मेरा सोचना, ना ही मेरा जीना और ना ही मेरा लिखना अव्यावहारिक है।
समानता और प्रेम
सर से जुड़ना स्वाभाविक रूप से हुआ। जैसे सभी छात्रों का हुआ होगा। मगर सर में जो सबसे विशेष बात मुझे लगती थी उन दिनों, वह था सर का अपने सभी छात्रों को एक समान देखना। सब को सम भाव में प्रेम करना, प्रेम देना। अपने हर एक छात्र के दुख के क्षणों में वह किसी अपने सगे से ज़्यादा उसका ख़याल करते। और वह ख़याल दिखावटी नहीं था। फ़ोन कर उनकी खबर लेना। शुभेच्छा और प्रार्थना से उनका मन भरा रहता। किन्हीं मुश्किल क्षणों में अपने किसी शिक्षक का कॉल करना, दो शब्द अपनत्व और प्रार्थना भरे उनके मुख से सुनना कितनी हिम्मत देता होगा, यह कहने की ज़रूरत नहीं। और यह कोई दो-चार छात्रों के लिए नहीं बल्कि लगभग हर किसी के लिए वह ऐसे ही हैं।
मुझे वह शिक्षक बचपन से बिलकुल पसंद नहीं आते जो किसी एक छात्र को या फिर कुछ छात्रों को ज़्यादा मानते। मुझे वह शिक्षक भी पसंद नहीं आते जो अपने छात्रों का मज़ाक़ स्टाफ रूम में शिक्षकों के बीच उड़ाते हैं, या फिर एक छात्र का मज़ाक़ दूसरे छात्र के सामने उड़ाते हैं। सर के मुख से मैंने कभी यह नहीं सुना। उनके भीतर की उदारता, सम्मान भाव मेरे लिए सदैव नमनीय है। और तभी मैं सहज हो पाई। अन्यथा कोई शिक्षक मुझे कितना भी माने, अगर वह अपने सभी छात्रों को एक तरह से ना मानता हो तो मैं कभी सहज नहीं हो पाती । सर ने जितना मुझे अपना माना, उतना ही सर ने अपने सभी छात्रों को अपना माना है; सर ने जितना अपने सभी छात्रों को अपना माना, उतना ही मुझे अपना माना – यह मेरे लिए किसी चमत्कारी उपहार से कम नहीं है।
अपने पिता को भी वैसे ही अपने हर छात्र के लिए बेचैन देखा है मैंने। मेरे लिए ना तो सर के यहाँ होने वाली बैठकें नई थीं, ना पढ़ने लिखने का मौहौल नया था। यह सब बचपन से मैं अपने घर देखते आई थी। जो नया था वह सर की कक्षाएँ, उनके पढ़ाने का तरीक़ा। स्कूल में कुछ इस तरह का तरीक़ा अपनाते हुए तो अपनी एक शिक्षिका को देखा था मगर कॉलेज और विश्वविद्यालय में ऐसे प्रयोग अनूठे थे। सर के शैक्षणिक प्रयोगों की चर्चा बहुत क़रीब से मैंने खूब सुनी थीं। सर बहुत लोकप्रिय थे पूरे विश्वविद्यालय में। खूब चर्चा होती थी उनके पढ़ाने के तरीक़ों की। सर की परीक्षा में पूछे जाने वाले सवाल का इंतज़ार सिर्फ़ उनके छात्रों को नहीं होता था बल्कि humanities पढ़ने वाले ज़्यादातर छात्रों को होता था। परीक्षा के दिन ही आग की तरह फैल जाता था कि सर ने क्या प्रश्न पूछा है। और फिर क्या था गंगा ढाबे से लेकर, चलते फिरते, उस पर पूरे विश्वविद्यालय में यहाँ वहाँ चर्चा सुनी जा सकती थी। ऐसी कुछ चर्चाओं की साक्षी रही हूँ तब भी जब मैं विश्वविद्यालय की छात्र नहीं थी, और उसके बाद भी जब मैं विश्वविद्यालय की छात्र बनी।
वर्तमान समय , निगरानी वाली शिक्षा : एक नई ग़ुलामी की ओर
अंतहीन कथा सी लग रही सर के शैक्षणिक प्रयोगों पर बात करना । मुझे लगता है सर के हर छात्र के पास बहुत कुछ होगा बताने के लिए। उनका हर प्रयोग अभिनव प्रयोग होता था। तब हमें इन प्रयोगों की असल क़ीमत पता होते हुए भी किसी ने इसे संग्रहित करने की आवयशकता नहीं समझी।मगर आज सर्विलेंस के इस दौर में जहां विश्वविद्यालय की हर कक्षा में कैमरा लगा होता है, जहां हर शिक्षक क्या पढ़ा रहा, अपने छात्रों से क्या बातें और क्यों कर रहा उस पर निगरानी रखी जा रही है, वैसे में भविष्य में या आज भी किसी की कल्पना से परे है कि कोई शिक्षक स्वतंत्र रूप से अपने छात्रों को पढ़ा सकता है- उन्हें सोचना, जीवन और सिद्धांतों के गहरे रिश्ते को देखना, उसे विश्लेषण करना भी बता सकता है । आज शायद ही कोई ऐसे प्रयोग करने की हिम्मत कर सकता है मुक्त रूप से।
शिक्षा पर सबसे ज़्यादा प्रहार किया गया है पिछले कुछ वर्षों में। वे सभी शिक्षण संस्थाएँ जो रचनात्मक रूप से शिक्षकों और छात्रों को बोलने, सोचने, लिखने, पढ़ने, शोध करने और जीने की आज़ादी देतीं थीं , उन सब का स्वरूप पूरी तरह बदलने का प्रयास लगातार जारी है। और यही कारण है कि सर निरंतर देश के उन अख़बारों में लगातार इसके ख़िलाफ़ निडर हो कर लिखते रहे, जिनकी पहुँच आम लोगों तक है। पूरे जन मानस का निर्माण वैसी शिक्षा के विरोध में खड़ा किया जा रहा जो बोलने, सोचने, कहने, पढ़ने- पढ़ाने की आज़ादी देता है। जो कल्पना करने की, विश्लेषण और आलोचना करने की आज़ादी देता है।
इस जन मानस का हिस्सा हम भी है। सर के पठन -पाठन के तरीक़ों को जानकर हम समझ सकेंगे कि हम अपने बच्चों को, अपने छात्रों को एक पैसा कमाने वाली मशीन से ज़्यादा कुछ नहीं बना रहे। उनके सोचने समझने की शक्ति को हम ग़ुलाम बना रहे। एक नई ग़ुलामी की ओर हम सब तेज़ी से बढ़ रहे।
एक शिक्षाविद की कक्षाएँ
सर की कक्षाएँ रचनात्मक और कलात्मक होतीं थीं। मगर ऐसा नहीं था कि उसकी कोई संरचना नहीं होती थी, वह structured होती थीं। सर के कोर्स का एक सिलेबस होता था। क्या क्या पढ़ा और पढ़ाया जाना है सब लिख कर छात्रों को अपनी लिखावट में देते थे। Reading Material तैयार कर के देते थे। कुल कितने लेक्चर होंगे, कितने assignment होंगे – सभी कुछ सर कोर्स की शुरुआत के पहले दिन बताते और लिख कर भी देते।
सर की कक्षाएँ क्लास रूम तक सीमित नहीं थीं। विश्वविद्यालय की अरावली की पहाड़ी पर उनकी कक्षा कभी होती थी, तो कभी किसी लॉन या मैदान में किसी वृक्ष के नीचे। सर के क्लास की संरचना ही बिल्कुल अलग थी। एक ऐसा वातावरण का निर्माण होता था जहां सीखने का असल उत्स अनुभव किया जा सकता था।
सोचने की आज़ादी
सर की pedagogy के केंद्र में एक और महत्वपूर्ण बात थी वह यह कि वह सोचने की आज़ादी देते थे। छात्र पहली बार उनकी कक्षा में आकर यह महसूस करते कि जो वह पढ़ रहे उसका उनके जीवन में क्या महत्व है या फिर किताबों से परे भी उनका एक अर्थ होता है। सर के पढ़ाने, छात्रों को अपने विषय से जोड़ने का तरीक़ा ऐसा होता कि छात्र किताबों से परे पढ़ने वाले विषयों का अर्थ ढूँढ लाने में सक्षम हो पाते थे। अगर सर cultural industry पढ़ा रहे तो उनके लिए यह महत्वपूर्ण होता था कि बच्चे यानी उनके छात्र ख़ुद को कैसे और कहाँ लोकेट कर पा रहे उसमें ।यह नहीं था कि वॉल्टर बेंजामिन ने क्या लिखा यह आप केवल पढ़ कर जा रहे। छात्र कौन सा कॉन्सेप्ट सीख कर जाएँगे, कौन सा आईडिया ले कर जाएँगे यहाँ से- सर के शिक्षण के केंद्र में यह होता था। सर जिस विचारक को पढ़ा रहे होते उससे अपने छात्रों का परिचय कराते, इतिहास में उस विचारक को कहाँ संदर्भित किया जा सकता है, यह बताते। और फिर यह भी बताते की आपके कोर्स में उस विचारक की क्या प्रासंगिकता है। और जिस तरह वह बताते, वह बोझिल अकादमिक ना होकर, एक कहानी की तरह आपके सामने से गुजर जाता। उसके बाद वह कॉन्सेप्ट को स्पर्श करते और छात्रों को संवाद में जाने के लिए प्रेरित करते। अगर विचारक ने यह कहा है तो आप इसे कैसे देखते हैं, इस पर वह कक्षा में बात करते। छात्रों को थोड़ी घबराहट तो होती थी, मगर सर हमेशा उत्साहित और प्रेरित करते कि आओ बोलो, सिर्फ़ मैं नहीं बोलूँगा, आप भी बोलो। सर की कक्षाएँ मोनोलॉग नहीं हुआ करती थीं, वह डायलॉग आधारित हुआ करती थीं। क्लास रूम के भीतर उनकी टीचिंग सिर्फ़ एक रीडिंग बेस्ड ना होकर बहुत फ्री फ्लोइंग हुआ करती थीं। और शायद यही वजह है कि कोई भी विचारक या सिद्धांत मृत नहीं होते थे उनके छात्रों के लिए। एक मोहब्बत सी हो जाती थी विचारकों से। वह जीवंत हो उठते थे छात्रों के लिए। यह भी था कि अगर सर कांत या हेगेल को पढ़ायेंगे तो कोई एक हिस्सा मात्र ही कांत का नहीं पढ़ायेंगे,बल्कि वह पूरा का पूरा कांत आपके सामने लाकर खड़ा कर देते थे, मगर इस रूप में कि छात्र स्वयं प्रेरित हों कांत को पढ़ने के लिए। ज़ाहिर है कोर्स के लिए बनाये जाने वाले रीडिंग मटेरियल में सीमित ही पढ़ने को होता था । मगर सर का कोर्स करने के बाद ऐसा जज़्बा उत्पन्न होता कि बाद में भी छात्र विस्तार से पढ़ने की प्रेरणा से भर जाते।
उदाहरण के लिए सर ने एक कोर्स लिया था -‘मॉडर्न इण्डियन सोशल थॉट’ (Modern Indian Social Thought)। सर की ही एक छात्र ने बताया कि ‘मॉडर्न इण्डियन सोशल थॉट’ कोर्स छह से सात थीम में बँटा था। उनमें से कुछ थीम में decolonization, caste, gender आदि एक थे। सर कोर्स के सभी थीम को छात्रों से परिचय करवाते अपने लेक्चर के माध्यम से और फिर छात्रों को उतने ही समूह में बाँट देते । वह छात्र बताती हैं कि इस कोर्स को करते हुए उनके समूह ने partition विभाजन के इर्द-गिर्द के narratives का चित्रण एक फ़िल्म के रूप में बना कर किया था। इसी कोर्स के छात्रों के दो समूह ने वॉल मैगज़ीन बनाया था बड़ा सा। वह कहती हैं ‘हमारे पास कोई थीम नहीं होती थी, मगर सर के पास ज़रूर होती होगी और सर हमें धीरे धीरे गाइड किया करते थे। उस दिशा में बढ़ने को प्रेरित करते थे बेहद सहज रूप में ।’
वास्तव में अगर हम सर की pedagogy को देखें तो वह सिद्धांतों का एक तरह से निरीक्षण करना सिखलाती है, चल रही वर्तमान सामाजिक राजनीतिक डिबेट और घटनाओं के संदर्भ में। इन सब के केंद्र में जीवन अवश्य होता था ताकि व्यक्ति और समाज के रिश्ते की संवेदनशीलता को थोड़े बेहतर ढंग से छात्र समझ सकें। इसी कोर्स में उन्होंने बच्चों को एक दिलचस्प असाइनमेंट दिया था freedom आज़ादी पर करने के लिए ।लेक्चर के दौरान यह प्रश्न आया था कि आज़ादी होती क्या है। इस पर एक समूह ने वॉल मैगज़ीन बनाया दीवार पर। जिसमें अलग अलग लोगों से पूछा गया था कि उनके लिए फ्रीडम यानी आज़ादी का मतलब क्या है। अपनी ही कक्षा के सहपाठियों के विचार को आज़ादी के बारे में समूह ने दीवार पर बेहद रचनात्मक तरीक़े से लगाया । साथ उसके अलावा कुछ नये अख़बारों की कटिंग उन्होंने फ्रीडम टर्म को नई नज़र से व्यक्त कैसे किया जा रहा इसे दिखाने के लिए लगाया। उन्होंने उस बड़े वॉल मैगज़ीन में भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास भी दिखाया और बीच में उन्होंने एक प्रचलित कहानी जिसमें एक बड़े हाथी को सात अंधे लोग छू कर अपने अपने अनुभव से बताते हैं कि वह क्या है, उस कहानी के पात्र बड़े हाथी को वॉल मैगज़ीन के बीच में दिखाया ।मूल रूप से यह कि आज़ादी का मतलब सब के लिए अलग अलग हो सकता है और उसे सर के छात्रों ने अलग अलग narratives को चित्रित कर वॉल मैगज़ीन पर दिखाया। कितना सुंदर उदाहरण है जिसमें सिद्धांत जीवन में उतर स्वयं के नये अर्थ और मायने तलाशने लगता है।
इस एक उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि सर की कक्षाएँ महज़ सिद्धांत आधारित नहीं होती थीं। किसी सिद्धांत को कक्षा में उसके संदर्भों के साथ सर ज़रूर रखते थे, मगर वहीं वह उस सिद्धांत की संभावनाओं को खोल कर रखने की चाभी भी अपने छात्रों को दे देते थे। पूरी स्वतंत्रता होती थी प्रयोगों की assignment करते वक़्त । मगर अनुशासन भी पूरा होता था। सर अपने छात्रों को अच्छी तरह आत्मिक अनुशासन की ओर मोड़ना जानते थे, कम से कम अपने कोर्स के दौरान तो ज़रूर ही।
प्रयोगात्मक अध्ययन कार्य (असाइनमेंट)
सर के असाइनमेंट बेहद रोचक हुआ करते थे। ज़्यादातर field work से जुड़े होते थे। Indian Social thought में मूल रूप से caste, migration, partition जैसे विषय होते थे। सर अक्सर छात्रों को कहते कि उन जगहों पर जाइए जहां लोग बाहर से आये हैं और उनके अनुभव, उनकी कथा ले कर आइये और क्लास में उसे रिप्रेजेंट करिए । Express oneself through different mediums and experience outside one’s own self । सर के कोर्स में दो बहुत महत्वपूर्ण बातें थी- वह यह कि वह छात्रों को प्रेरित करते थे स्वयं को विभिन्न माध्यमों से व्यक्त करने के लिए, साथ ही अपने स्व के बाहर आकर औरों के माध्यम, दूसरों के अनुभव और कहानी से स्वयं का विस्तार करने के लिए । एक बार उन्होंने अपने कोर्स के दौरान असाइनमेंट के लिए छात्रों से कहा कि वे प्रोफेसरों के घर से waste यानी कचड़ा इकट्ठा कर के लायें। ऐसे ही एक कोर्स का हिस्सा बना सुबह के पाँच बजे सभी छात्रों का एक साथ मॉर्निंग वाक पर जाना।
सर की छात्रा सबिहा बताती हैं, ‘सर के लिए असाइनमेंट अपने स्टूडेंट को स्वयं को व्यक्त करने का एक अवसर होता था । वे हमें पूरी आज़ादी देते थे। हम लोगों ने ग्रुप बनाकर कोर्स के अलग अलग विचारकों पर अलग-अलग वॉल मैगज़ीन बनाया था। हमें पूरी आज़ादी थी- किसी ने कोई आर्ट फॉर्म इस्तमाल किया, तो किसी ने कुछ। बड़े बड़े चार्ट पेपर पर छह अलग अलग थिंकर के ऊपर वॉल मैगज़ीन बना हम लोगों ने विभाग के गलियारों को उससे सजा दिया था। ऐसा नहीं था कि हम सिर्फ़ किताबों में या रीडिंग मटेरियल में विचारकों को पढ़ रहे थे, और पढ़ कर भूल जा रहे थे।’
वास्तव में वह एक उत्सव था – जैसे ही आप विभाग के गलियारों से होकर गुजरते हैं, आपको विश्व के महान विचारक मुस्कुराते, बोलते दिख जाते। एक अभूतपूर्व संवाद उन विचारकों और छात्रों के बीच होता आप देख सकते थे। एक उत्सव सा महसूस होता था। जैसे जीवंत हो उठा था विभाग। सिर्फ़ मैं ही नहीं कई लोग उसे बार बार देखने गये, ख़ासकर उस समय जब विभाग थोड़ा शांत होता था। शांति में उस संवाद का असल आनंद उठाया जा सकता था। सर के प्रयास ने विचारकों के माध्यम से उन्हें मृत किताबों और सिलेबस से निकाल कर उन्हें जीवित ही नहीं किया था, बल्कि पूरी शिक्षण प्रणाली में प्राण वायु भर दिया था। आप विभाग की दीवारों को वास्तव में धड़कता हुआ महसूस कर सकते थे।
परीक्षाएँ
सर के परीक्षा लेने का तरीक़ा भी बेहद जुदा था। निराला। परीक्षाएँ हमेशा reflective और communicative होती थीं सर के कोर्स की। सर की परीक्षा का रंग हर बार कुछ अलग होता था। एक बार सर ने बांसुरी या किसी अन्य वाद्ययंत्र का संगीत मद्धम आवाज़ में बजाया… धीरे-धीरे मंद गति में संगीत चल रहा था और छात्र अपनी परीक्षा दे रहे थे। परीक्षा में संगीत के साथ चाय/कॉफ़ी भी बच्चों को दिया गया। चाय के साथ अपनी परीक्षा देने की उन्हें आज़ादी थी।
सर किताब खोल कर भी लिखने की अनुमति देते थे अपनी परीक्षाओं में।क्योंकि प्रश्न ऐसे होते ही नहीं थे जिसमें छात्र किताब से किसी तरह की नक़ल कर सकें। बहुत साधारण दिखने वाले प्रश्न देते वह, जैसे – मार्क्स और ग्रामसी आज मिलेंगे तो क्या बात करेंगे। ऐसे प्रश्न में कॉपी करने की संभावना होती ही नहीं है। ऐसा ही एक प्रश्न सर ने एक बैच को दिया जिसमें उन्होंने कहा कि मार्क्स और वेबर आपस में आज मिल रहे कॉफ़ी पर, और वह whole crises of Modernisation पर बात कर रहे, बतायें वह आपस में क्या चर्चा कर रहे होंगे। यकीनन इसके पीछे सर का उदेश्य अपने स्टूडेंट्स के भीतर की तर्क शक्ति, कल्पना शक्ति, विश्लेषण और आलोचना की शक्ति का विकास करना था। कई बार सर ने परीक्षा को समय सीमा से भी आज़ाद किया है। प्रश्न दे देते और कहते कल तक लिख कर जमा कर दें। सर के परीक्षा के प्रश्न भी समसामयिक होते थे, चाहे वह classical social Thinker पढ़ा रहें हो या Modern Indian Social Thinker.
सर की परीक्षा ऐसी नहीं होती थी कि प्रश्न आपको मिल गया हो, और आपको लगातार तीन घंटे बैठ कर लिखना है। सर की परीक्षाएँ ज़्यादातर दो हिस्सों में बँटी होती थीं -ऐसा सबिहा ने बताया। सबिहा बताती हैं – ‘सर हमें प्रश्न देते, पहला पार्ट हम एक घंटे के लिए मान लीजिए लिख लिखते, फिर सर ब्रेक देते।उसके बाद कोई फ़िल्म का हिस्सा, या कोई वीडियो का हिस्सा दिखाते, या फिर कोई संगीत का हिस्सा सुनवाते। फिर वह दिये गये प्रश्न का उत्तर लिखने को कहते दिखाए गए वीडियो या संगीत को ध्यान में रखते हुए। पहला हिस्सा तो फिर भी आपने जो विचारक पढ़ें हैं उनमें से आप कुछ लिख सकते हैं। मगर परीक्षा के दूसरे हिस्से में प्रश्न ऐसा देते थे सर कि स्टूडेंट को सोचने पर मजबूर होना पड़ता था।’ बहुत रचनात्मक तरीक़ा था सर का छात्रों के सोचने-समझने, कल्पना की शक्ति को बढ़ाने का।
भविष्य की प्रेरणा
वास्तव में सबिहा ने जो हमें बताया वह कुछ एक उदाहरण सर के पढ़ाने, परीक्षा लेने के तरीक़ों के बारे में उनकी कक्षा और कोर्स का अनुभव था। सर हर बार लगभग कुछ नया प्रयोग करते थे। अगर सर के सभी शैक्षणिक प्रयोगों को इकट्ठा किया जाये तो आज कल के पढ़ने-पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए बहुत उपयोगी संग्रह साबित होगा।
सबिहा मज़ीद आज स्वयं दिल्ली विश्वविद्यालय के जीसस मेरी कॉलेज में पढ़ा रहीं हैं लगभग चार सालों से। सर उनके प्रेरणा कैसे बने हैं वह विस्तार से इसके बारे में खुल कर बताती हैं – ‘आज जब मैं स्टूडेंट को पढ़ाती हूँ, तो सर का सिखाया मुझे हमेशा याद रहता है । सर ने जैसे हमें बताया कि किसी विचारक या किसी सिद्धांत से कैसे कनेक्ट किया जा सकता है, उसके एप्लीकेशन आज क्या हो सकते हैं, वैसे ही मैं अपने स्टूडेंट्स के साथ करने की कोशिश करती हूँ। मुझे लगता है यह सीखाने का सबसे अच्छा तरीक़ा है। सर ने मुझे जो भी पढ़ाया वह आज भी पूरी तरह याद है। क्योंकि सर ने हमें किताब से बाहर भी देख पाने में सक्षम बनाया है ।अपनी सीमित आज़ादी में भी मैं जितना हो सके सर के द्वारा सीखी गई pedagogy का इस्तमाल करने का प्रयास करती हूँ। उस तरह से तो मुश्किल है। मगर हाँ छात्र कनेक्ट कर सकें, उसका पूरा प्रयास करती हूँ।’
सिर्फ़ सबिहा ही नहीं, सर के सानिध्य में पढ़ कर, शोध कर निकलने वाले ज़्यादातर छात्र जो आज स्वयं एक शिक्षक हैं, ज़रूर ही सर से प्रेरणा ले पठन -पाठन को नई चेतना के साथ जीवित रखने का प्रयास कर रहे होंगे।
यह तो पठन -पाठन की बात हुई। मगर सर सिर्फ़ एक शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि एक मनुष्य के रूप में कितने सहज और महान हैं, इसे हम वर्ष 2016 के माध्यम से समझ सकते हैं।
2016 : छलछलाती आँखों और हृदय की तड़पती गाथा
आँखें। हृदय।
दृष्टि। गति।
विशालता। गहराई।
हृदय इन आँखों की बुनावट में उलझी अनगिनत धमनियों की गति को देख सकता है । हृदय में सहस्र खिड़कियाँ और दरवाज़े होते हैं। जब एक-एक कर के दरवाज़े- खिड़कियाँ, खिड़कियाँ-दरवाज़े बंद होने लगते हैं तो गति रुक जाती है। आँखें बंद हो जाती हैं। खुली आँखें भी। खुली आँखें भी बंद हो जाती हैं। और यही दरवाज़े-खिड़कियाँ, खिड़कियाँ-दरवाज़े जब एक-एक कर खुलने लगते हैं, खुल जाते हैं तो हृदय आँखों की बुनावट में उलझी एक-एक धमनियों के आवागमन को पढ़ने लगता है। हर एक तंत्रिका मौन में पारदर्शी दिखने लगती हैं। तंत्रिकाओं की दृष्टि को बहुत दूर, हाँ दूर जाने की ज़रूरत नहीं होती वह यहीं बैठे बैठे स्पर्श कर सकती है आँखों की धमनियों में हलचल पैदा करती भावनाओं को, जिनकी छवि आँखों के कैनवास पर महा मौन की शांति में प्रकाशित हो स्वयं खींच जाती हैं ।
इन आँखों की यात्रा पर न जाने कितनी ही बार, शायद अनगिनत बार निकली हूँ।
वर्ष था 2016 , जब मुझे इन आँखों की गहराई के पार उतर जाने का संदेश मिला । विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी करने का भी वर्ष था यह। देश में और पूरे विश्व में जेएनयू को बदनाम करने की साज़िश शुरू हुई।
सर जेएनयू की आत्मा को कुचलने के लिए होने वाले राजनीतिक प्रयास से बहुत विचलित थे। छात्रों का दमन हो रहा था। जेएनयू में उपद्रवी लोग आये दिन कुछ ना कुछ कर रहे थे। जेएनयू प्रशासन नये नये नियम बना जेएनयू की आत्मा को हर दिन अलग अलग रूपों में कुचल रहा था। समूचा जेएनयू – शिक्षक, छात्र, कर्मचारी हतप्रभ और व्यथित थे।
मैं नियमित रूप से सुबह मॉर्निंग वाक पर जाया करती थी। सर का रेसिडेंस और गंगा छात्रावास बिलकुल एक दूसरे के पड़ोस में हैं। मैं गंगा छात्रावास में उन दिनों रह रही थी। इस घटना से पूर्व भी कभी कभी मॉर्निंग वाक से वापस लौटते हुए सर से मुलाक़ात हो जाया करती थी। आम तौर पर सर अपने रेसिडेंस के बाहर टहलते, अख़बार पढ़ते, या चाय पीते नज़र आ जाते थे। कई बार मैं मॉर्निंग वाक से वापस लौटेते हुए हरसिंगार के फूल पत्तों की नन्ही टोकरी बना उसमें चुन कर रख कर ले जाती थी मैडम की तस्वीर के पास एक काँच की कटोरी में रखने । सर ने एक रोज़ बताया था – नूतन मैडम को ये फूल बहुत पसंद थे। अक्सर मैं सुबह जल्दी उठती थी। कई दिन मैं सर के दरवाज़े के पास रखी चौकी पर मॉर्निंग वाक से वापस लौटते हुए फूल चुपचाप रख कर चली आती थी। यह आम तौर पर रूटीन था मेरा तब जब मैं जेएनयू में होती थी। कोशिश होती थी कि सर की सुबह डिस्टर्ब ना हो। कई बार सर हॉस्टल के आस-पास टहल रहे होते थे तो कहते -‘आइये शेफाली, चाय पीते हैं।’
ये तो राजनीतिक उथल-पुथल के पूर्व की बातें हैं। उन दिनों जिस तरह से अख़बार जेएनयू में होने वाली घटनाओं के बारे में लिख रहे थे, वह भी कम विचलित करने वाले नहीं थे। सर को मैंने देखा हर रोज़ बेचैन हो कर टहलते हुए। इतने बेचैन कि डर लगता था सर की तबीयत ना ख़राब हो जाए। बहुत लंबी बातें हुईं सर से, कई दिन, लगभग हर सुबह। मैं हमेशा की तरह टहलने निकलती सुबह। टहलने जाने से पूर्व एक बार सर के घर के बाहर देखती। दरवाज़ा बंद देख, सुकून मिलता । अच्छा लगता कि सर सो रहे। जितनी जल्दी जागेंगे, उनकी बेचैनी उतनी जल्दी शुरू हो जाएगी। फिर वापस लौट कर चुपचाप देखती दूर से झांक कर, मगर अक्सर सर दिख जाते, और कहते- ‘come Shephali, see what is happening….yesterday vice-chancellor….’ सर से लंबी बातचीत होती। कई बार मैं चुपचाप उन्हें सुनतीं । वह सुनना सिर्फ़ सुनना नहीं था। सर की आँखों की प्रत्येक धमनियाँ धड़कती थीं। मैंने उन धमनियों में भविष्य को बेचैन तड़पते देखा है। बात करते हुए कई बार ऐसा होता कि जेएनयू के लिए सर की चिंता आँखों में तैरती हुई बाहर आने को विकल हो जाती, वैसे समय में हम चुपचाप ख़ामोश बैठे रहते । उस खामोशी में भी एक एक धमनियों के भीतर के रक्त-प्रवाह को मैंने महसूस किया है।
सुबह का समय जल्दी स्नान- ध्यान के बाद थीसिस लिखने और लिखे हुए को पढ़ कर एडिट करने का होता था मेरे लिए। मगर अब मेरी सारी थीसिस का केंद्र वे बेचैन धमनियाँ, और उनका रक्त प्रवाह था। मैं और मेरे एक मित्र ने सर के सुबह सुबह अख़बार पढ़ने पर चिंता जताई। मित्र ने तो यह तक कहा कि क्यों ना सुबह सुबह सर के उठने से पहले सर का अख़बार ही ग़ायब कर दिया जाये। पहले मुझे मज़ाक़ लगा यह। मगर सर को इतना चिंतित देखने के बाद लगा कि वास्तव में यह किया जाना चाहिए। मित्र ने कहा, सुबह उठा लिया जाये अख़बार, और दोपहर को डाल दिया जाये। मगर हमने ऐसा कुछ नहीं किया।
सर ऐसे तड़प रहे थे, जैसे उनके अपने बच्चे को कोई मार रहा हो। और क्यों ना हो, जेएनयू सर और सर जैसे उन सभी शिक्षकों के लिए जो यहीं पढ़े और अब यहीं पढ़ा रहे, एक माँ, एक दोस्त, एक बच्चे की तरह है, जिसने उनके जीवन और उनके व्यक्तित्व को बनाने में एक अहम भूमिका निभाई है और जो अब स्वयं जेएनयू के वर्तमान और देश के भविष्य को बनाने में एक अहम भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में सर की आँखों में सहज तैरती नन्ही बूँदों की नमी हमेशा मेरी और सर के कई छात्रों की आँखों में भी उतर आती थी ।
हमारे समाज में शिक्षक को बड़ा स्थान दिया गया है। दिया जाना भी चाहिए। सर जैसे शिक्षकों की वजह से यह दुनिया अब भी सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रही है । मगर छात्र भी अपने शिक्षक की जीवन यात्रा में प्रार्थना स्वरूप उपस्थित रह कर मुक्ति मार्ग को खोल सकते हैं , यह रूढ़िवादी समझ से परे है। कई बार किसी एक छात्र का मासूम प्रश्न, किसी छात्र की सहज हंसी शिक्षक के जीवन में कितनी अहम भूमिका निभा सकती है, यह अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। हर संबंध अगर उसका आधार खुलापन है, पारदर्शिता है तो वह कभी एक तरफ़ा नहीं होता। लेना और देना – रिसीव करना, और ऑफर करना दोनों ही उसमें होते हैं। छात्र और शिक्षक का संबंध भी ऐसा ही होता है। किसी छात्र की मौन उपस्थिति भी बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकती है एक शिक्षक के जीवन में।
मैंने अपने पिता को देश में घटने वाली घटनाओं से विचलित होते , तड़पता पाया है। मैंने अपने पिता की आँखों की धमनियों के उतार-चढ़ाव को महसूस किया है। मैं बहुत गहरे रूप में सर की तड़प और बेचैनी, उनकी तकलीफ़ महसूस कर सकती। सिर्फ़ मैं ही नहीं सर के कई छात्रों ने उनके लिए यह महसूस किया है ।
सर का योगदान अभूतपूर्व है। साथ ही सर के जीवन में उनके अनगिनत छात्रों की प्रार्थना का भी योगदान अभूतपूर्व है जो उन्हें सदैव एक सुरक्षा कवच प्रदान करता रहा है। ठीक वैसे ही जैसे सर की उपस्थिति उनके स्टूडेंट्स को एक बड़ा संबल प्रदान करती रही हैं । हम सब के जीवन में ऐसे अनदेखे, जाने पहचाने लोगों की प्रार्थना, शुभेच्छा साथ होती है, जिसे हम कई बार महसूस ही नहीं करते बल्कि उसका अनादर भी करते हैं।आज इसे विशेष रूप से समझा जाना चाहिए। आज शिक्षक जिस तरह छात्रों को देखते हैं, और छात्र जिस तरह शिक्षकों को देखते हैं उस दृष्टि में सम्मान का भाव कम, मतलब का भाव ज़्यादा होता है। सर जैसे शिक्षक और छात्रों की मासूमियत आज भी बनी है शायद तभी इतनी हिंसा के बावजूद यह पृथ्वी अब भी जीने लायक़ है।
सर के भीतर अगर आकाश की विशालता के साथ साथ धरती की गहराई भी है, तो उसका सबसे बड़ा कारण सर का पढ़ाते हुए भी सदैव एक learner बना रहना है । एक शिक्षक का ज्ञान वहीं दम तोड़ देता है, जहां वह स्वयं सीखना बंद कर देता है।
सर की आँखों से जुड़ी धमनियों के रक्त संचार की गति मुझे आज भी दिखती है। दूर हूँ फिर भी। 2016 में वह भविष्य की संभावनाओं को कुचले जाने को ले कर बेचैन थीं , आज उनमें भविष्य के सपने जगमगा रहे।
आज सर गाँव के बच्चों के साथ आनंद पूर्वक गणित के पठन-पाठन में लगे हैं। कितना सुंदर है- एक समाजशास्त्री अपना प्रिय विषय गणित पढ़ा रहा बच्चों को। यह सब देखना सुकून देता है। इस कथावाचक छात्र की इच्छा है कि वह जिस गाँव में भी रहे , वहाँ प्राकृतिक परिवेश के बीच सर के रहने के लिए भी एक सुंदर स्थान बनाये , जहां सर का जब मन करे वह आयें और गाँव के बच्चों को अपने प्रकाश से प्रकाशवान करें। सर को एक नहीं, कई गाँवों के बच्चों तक पहुँचना है।
पृथ्वी आज भी बहुत सुंदर है, क्योंकि विश्व के महानतम विश्वविद्यालयों में से एक विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाला एक इतना विद्वान, शिक्षाविद् व समाजशास्त्री शिक्षक गाँव के बच्चों के संग पठन -पाठन का काम कर रहा प्रकृति की गोद में बैठ। एक नई यात्रा। एक नया प्रयोग। बच्चों में संभावनाओं के नये नये द्वार खोलता उनका अभिनव शिक्षण।
हाँ, पृथ्वी आज भी सुंदर है। और सदैव सुंदर रहेगी, क्योंकि ना तो ऐसी कथाएँ कभी ख़त्म होंगी, ना इन्हें वाचने वाले कथा वाचक।

