शीतल जल कब इस ज्वाला को बुझायेगा…

जीवन-मरण, ज्ञात-अज्ञात की प्रार्थना का कवि

‘तुम सुबह की पहली किरण/मैं नम दूब पर ओस का कण/मिलन पर सुनश्चित है/मेरा तिरोहित हो जाना/ फिर भी मिलन की इतनी आस क्यों है/ प्राणों में इतनी प्यास क्यों है/ मरण का इतना उल्लास क्यों है’ – अज्ञात 

कई बार कोई गीत कोई कविता चुपचाप हौले से छू जाती है। कभी जीवन में मरण का उल्लास बनकर तो कभी मरण में जीवन का उल्लास बनकर। कवि बनकर न जाने कितना कुछ रचने लगता है हृदय उसके प्रभाव में ।और हृदय रचने की प्रक्रिया में सब कुछ भूल कर एक कोरा कैनवास बन जाता है। हृदय कैनवास बनकर दुनिया को सजाने लगता है कल्पना की कूंची  से, सृष्टि के रंगों में डूब कर।

उपरोक्त कविता किसकी है, नहीं पता। आधुनिक दार्शनिक रजनीश, (ओशो के नाम से प्रसिद्ध) उन्हीं की किसी किताब में इसे उद्धृत पाया था, बिना किसी नाम के, आज से कई साल पहले, शायद तीस वर्ष पहले। और अंकित हो गई हृदयस्थल पर। अक्सर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को याद उनकी अपनी रचना के हवाले से किया जाता रहा है, मगर आज न जाने क्यों ऐसा लगा कि एक मर्मभेदी पर बात इस मर्मभेदी कविता से शुरू की जाये जिसका कवि अज्ञात है। जिसे कई बार ढूँढने की कोशिश की मगर हर बार अज्ञात की ओर बढ़ते कदम ही मिले।

 अज्ञात की ओर बढ़ना, अज्ञात के हवाले  स्वयं को पूरी तरह सौंप देना टैगोर को अत्यंत प्रिय  था। उनकी कई कविताओं और गीतों में अज्ञात में आनन्दोल्लास मनाते वह आपको मिल जाएँगे। यह उनकी रचना की शक्ति है। अपनी कविता ‘व्यक्त प्रेम’ जो उन्होंने 24 मई 1888 में लिखी, उसमें भी स्त्री मन में बसे प्रेम को वह रचनाशीलता के माध्यम से अज्ञात में सुदूर क्षितिज के उस पार, कहीं दूर, बहुत दूर किसी वन में अपने आराध्य के लिए फूल चुनते पाते हैं, और उनके शब्द काव्य प्रेमी को अपने स्पर्श से वहीं ले कर चले पड़ते हैं।

‘जब मैं पूजा के फूल चुनने जाती –
उस छायामय पथ पर, उस लतापूर्ण घेरे में,
सरसी के उस तट पर जहाँ कनेर का वन है –
तब शिरीष की डाल पर कोकिल कूजन करते;
भोर-भोर सखियों का मेला लगता,
कितनी हंसी उठती, कितने खेल होते।
किंतु, कौन जानता था कि प्राणों की आड़ में
छिपा हुआ क्या है?

मानसी एक अज्ञात की ओर बढ़ रही-‘ किंतु, कौन जानता था कि प्राणों की आड़ में/ छिपा हुआ क्या है?’ अज्ञात और ज्ञात को प्राकृतिक सौंदर्य में पिरो कर हर बार वह अपने आराध्य के चरणों में समर्पित कर जाते – कभी सवाल बनकर, कभी समर्पण बनकर, कभी अंधकार बनकर, कभी ज्योतिपुंज  बनकर तो कभी प्रार्थना बनकर।

उनकी कविता ‘यथास्थान’  में सवाल प्रार्थना बनकर शुरू होती है ‘किस हाट में तू बिकना चाहता है अरे ओ, मेरे गान?/किस जगत तेरा स्थान?’। प्रार्थना के रूप में यह प्रश्न यात्रा करते हुए समाज की विसंगतियों को स्पर्श करते, समेटते हुए चलता है –

परीक्षा की पढ़ाई में किशोर छात्र पुस्तक पर झुका हुआ है,
किंतु, मन उसका कहाँ है, किस दिशा में भटक रहा है?
सभी अपाठय पुस्तकें पाठ्य बनकर सामने खुली हैं,
कविता अभिभावकों के भय से छोटी पेटी में बंद है।
फटी-चिटी पुस्तकों की वहाँ अस्त-व्यस्त भीड़ है।
उनके बीच ओ मेरे चपल! क्या तू क्रीड़ा करेगा?’

इस कविता में टैगोर एक प्रश्न की यात्रा में सिर्फ़ एक नहीं बल्कि कुछ सामाजिक विसंगतियों को उजागर करते हैं जो शिक्षा और ज्ञान की गहरी खाई को प्रकट करता है। वह जिसे लक्ष्मी माना जाता है, वह कैसे बीच बीच में तड़प कर ‘तकिये के नीचे दबी पुस्तक को खींचकर वह निकालती है’, यह स्त्री की उस तड़प को भी चित्रित करता है जहां वह ज्ञान के माध्यम पुस्तक के सानिध्य के लिए विरह में तड़प तड़प कर उस ओर दौड़ती है। और प्रश्न की यह यात्रा ठहरती है , पूछती है – ‘ किस हाट में तू बिकना चाहता है अरे ओ, मेरे गान?/ तुझे प्राण कहाँ प्राप्त होंगे?’ ज्ञात के बीच प्राणों की छटपटाहट अज्ञात की ओर दौड़  लगा कर अपनी संजीवनी ढूँढती है –

पक्षी उन्हें गीत सुनाते हैं, नदी कथा सुनाती है;
पुष्प, लता और पत्र, जाने कितने प्रकार के छंद सुनाते हैं।
उस जगह सरल हंसी और सजल नयनों के पास
विश्व-वंशी की ध्वनि के बीच जाने की साध है क्या?
हठात् उच्छवसित होकर मेरा गान कहता है,
“मेरी जगह वही है।”

‘अपनी कविता ‘समालोचक’ में वह शिशु के एक प्रश्न के रूप में महत्वपूर्ण सवाल लेखकों के सामने रखते हैं – ‘हर घड़ी/ लिखना और लिखने का खेल।…बता तो, सच बता/ लिखने से होता क्या है आख़िर।’ जिन प्रश्नों  को टैगोर अपनी कविता के माध्यम से प्रकाशित कर रहे थे, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, शायद कहीं ज़्यादा प्रासंगिक हैं अब।

टैगोर की काव्य यात्रा की जाये तो हमें जैसे जैसे प्रश्नों से साक्षात्कार होता जाता है, वैसे वैसे हम गहरे उतरते चले जातें हैं और हमें उन प्रश्नों के उत्तर भी मिलते चले  जाते हैं।

मैं तुम्हारी सौगंध खाकर कहता हूँ
कि यदि अपनी तपस्या के बल पर
नवीन हृदय में कोई नवीन संसार न गढ़ सका
यदि वीणा के तारों को झंकृत करके
किसी के मर्म तक न पहुँच सका
किसी नई आँख के इंगित को न पहचान सका
तो मैं तपस्वी नहीं बनूँगा
उस तपस्विनी को पाये बिना
मैं तपस्वी नहीं बनूँगा।

शब्दों और भावों के जोड़ तोड़ से कोई कवि या लेखक नहीं बनता। एक लेखक, कवि, कलाकार को सधना और साधना होता है स्वयं के ज्ञात और अज्ञात को। कुछ होने और नहीं होने को साधना होता है एक तपस्वी बनकर ।मगर तपस्वी होने के लिए उसे सबसे पहले एक तपस्विनी चाहिए और यह तपस्विनी कौन है- जो संसार और असंसार के बीच सेतु बनती है। कवि की प्रतिज्ञा है कि उस सेतु के बग़ैर वह तपस्वी नहीं बन सकेगा। 

और इस तपस्वी की मुक्ति असंख्य बंधनों से गुजरते हुए मुक्ति बनकर जल उठेगा, भक्ति बनकर फैलेगा –

‘मेरा मोह मुक्ति बनकर जल उठेगा
मेरा प्रेम भक्ति बनकर फलेगा।’

टैगोर की ‘वधू’ कविता विकल कर देती है। वह अंधेरे को चीर कर प्रकाश लाने में स्वयं को असक्षम पाती है और अंधेरे की गोद  में ख़ुद को समर्पित करने की व्याकुलता से भरी है।

“चाँद यहाँ की छत के उस तरफ़ निकलता है माँ
कमरे के द्वार पर आकर प्रकाश
प्रवेश की आज्ञा माँगता है।
मानों मुझे खोजते हुए देश-देश में भटका है,
मानों वह मुझे प्यार करता है, चाहता है।
इसलिए एक क्षण के लिए अपने को भूलकर
विकल होकर दौड़ती हूँ द्वार खोलकर।
और तभी चारों तरफ़ आँखें सतर्क हो जाती हैं,
शासन की झाड़ू उठ जाती है।
न प्यार देते हैं न देते हैं प्रकाश !
जी कहता है, अंधेरे, छाया से ढके हुए
तालाब के उसी ठंडे काले पानी की
गोद में जाकर मर जाना अच्छा है।”

मगर वधू कविता में जहां जीवन के अंधकार का चित्रण है वहीं इस कविता  के समापन की कुछ पंक्तियों में जिस तरह ‘शीतल जल’ का प्रयोग हुआ है, वह एक ज्योतिपुंज  के रूप में प्रस्तुत होता दिख रहा।

‘लो मुझे पुकारो, तुम सब मुझे पुकारो –
कहो, ‘समय हो गया, चल पानी भर लाएँ।’
समय कब होगा
कब समाप्त होगा यह खेल,
यदि कोई जानता हो तो मुझे बताए,
शीतल जल कब इस ज्वाला को बुझायेगा!

कवि के लिए जीवन का ज्ञात एक ज्वाला की तरह जलता है। अज्ञात की दौड़ के लिए प्रेरित करता है। यही अज्ञात अनंत की ओर, एकत्व की ओर ले जाता है। कवि के अनुसार यह अनंत, यह आनंद, यह  एकत्व और कुछ नहीं प्रेम है। अपनी पुस्तक ‘क्रिएटिव यूनिटी’ के परिचय में टैगोर लिखते हैं –

‘प्रेम में हमें वह आनन्द मिलता है जो परम है, क्योंकि वह ही परम सत्य है। इसीलिए उपनिषदों में कहा गया है कि अद्वैत अनंत है, -‘वही अनंत है’; कि अद्वैत आनंद है, -‘वही प्रेम है।’

अनेक के सामंजस्य के माध्यम से एक, अनंत को पूर्ण अभिव्यक्ति देना; स्वयं के बलिदान के माध्यम से एक, प्रेम को पूर्ण अभिव्यक्ति देना, हमारे व्यक्तिगत जीवन और हमारे समाज का समान रूप से उद्देश्य है।’

युद्ध के भीषण प्रहार से विश्व कई रूपों में गुजर रहा। जिस सामंजस्य और प्रेम की यात्रा हम महाकवि के गीतों और कविताओं में पाते हैं उसके लिए वह किस तरह विकल थे, यह सन् 1901 में उनकी लिखी कविता ‘त्राण’ पढ़ने से हमें पता चलता है –

‘हे मंगलमय, इस अभागे देश से
सर्व तुच्छ भय दूर कर दो।
लोक-भय, राज-भय और मृत्यु-भय
प्राण से दीन और बल से हीन का यह असभ्य भार
यह नित्य पिसते रहने की यंत्रणा
नित्य धूलि-तल पर आत्मा का अपमान
भीतर-बाहर दासत्व के बंधन
हज़ारों के पैरों के नीचे बार-बार त्रस्त आउट नतशिर होकर
मनुष्य की मर्यादा गौरव का अपहरण परिहरण
मंगलमय अपने चरण के आघात से
इस विपुल लज्जा-राशि को
चूर्ण करके दूर कर दो
अनंत आकाश उदार आलोक
उन्मुक्त वातास से भरे हुए मंगल प्रभात में
सिर ऊँचा करने दो।’

इसी साल महाकवि की लिखी कविता ‘प्रार्थना’ नैवेद्य स्वरूप अपने परमेश्वर के चरणों में  वह समर्पित करते हैं।इस प्रार्थना में समस्त अंधकार और अज्ञानता, अहं और द्वेष तिरोहित हो जाते हैं, उस अज्ञात कवि की ओस की बूँद की तरह जो सूर्य की प्रथम किरण को पाकर, मरण का उल्लास मनाते, मिलन के आनंद में अपनी समस्त पहचान के साथ तिरोहित हो जाती है।

प्रार्थना
चित्त जहाँ शून्य, शीश जहाँ उच्च है
ज्ञान जहाँ मुक्त है, जहाँ गृह-प्राचीरों ने
वसुधा को आठों पहर अपने आँगन में
छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर बंदी नहीं किया है
जहाँ वाक्य उच्छवसित होकर हृदय के झरने से फूटता
जहाँ अबाध स्रोत अजस्त्र सहस्रविधि चरितार्थता में
देश-देश और दिशा-दिशा में प्रवाहित होता है
जहाँ तुच्छ आचार का फैला हुआ मरुस्थल
विचार के स्रोत पथ को सोखकर
पौरुष को विकीर्ण नहीं करता
सर्व कर्म चिंता और आनंदों के नेता
जहाँ तुम विराज रहे हो
हे पिता, अपने हाथ से निर्दय आघात करके
भारत को उसी स्वर्ग में जागृत करो!’

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Shephali is an independent researcher, writer and educationist.

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2 Comments on “शीतल जल कब इस ज्वाला को बुझायेगा…”

  1. बहुत बढ़िया लिखा है आपने।

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