संवाद : भाग एक
(संवाद श्रृंखला में चित्रलेखा आज एक माँ-बेटी के बीच की बातचीत ले कर आये हैं। ऐसे संवाद का हम स्वागत करते हैं, जिनमें सामाजिक मूल्यों और मसलों के ऊपर बातचीत की गई हो।)
यह माँ-बेटी के बीच का संवाद है, जो मूलतः बदलते जीवन में बदलते मानवीय मूल्यों पर एक चर्चा है। ऐसी चर्चा परिवार में हर संबंध के बीच होनी चाहिए। आम तौर पर परिवार में कभी बड़े अपना फ़ैसला सुना देते हैं, कभी बच्चे। मगर संवाद नहीं होता दो के बीच। बस फ़ैसला सुनाया जाता है। अच्छा और बुरा मान कर नदी के दो किनारे की तरह जीवन जीते हैं लोग। जिनका मिलना बग़ैर संवाद के, सवाल और जवाब के संभव नहीं। संवाद के बिना प्रेम नहीं। संवाद के बिना सम्मान भी संभव नहीं।
पिछले दिनों माँ से एक विशेष चर्चा हुई।माँ ने बड़े सवाल किए। एकदम कड़क सवाल। जिसे मुझे सब से साझा करना चाहिए, ऐसा लगा। अक्सर लोग संघर्षशील दुनिया की बात करते हुए अपने निजी जीवन को ढकने का प्रयास करते हैं। क्योंकि निज जीवन पर बात करने के लिए साहस चाहिए, पारदर्शिता चाहिए। जो आम तौर पर प्रगतिशील दिखने और होने की ललक हमारे भीतर होती है यह साहस और पारदर्शिता उसकी एक-एक सच्चाई को वह उधेड़ कर रख देती है।ऐसा लगता है कई बार कि जितना संघर्ष हुआ उस अनुरूप चेतना में परिवर्तन नहीं हो पाया। सदियों शताब्दियों के संघर्ष के बाद भी। शायद उसका यही कारण है कि विचार में क्रांति आई पर आचरण में नहीं। ऐसा लगा कि आचरण में आ गई है क्रांति मगर ज़्यादातर वह आचरण भी दिखावे का रहा। शायद इसलिए दूसरों की बातें करना, उन्हें अच्छा- बुरा साबित कर स्वयं को हम सारी ज़िंदगी एक दिलासा देते रहते हैं कि हम औरों से बेहतर हैं और किसी बड़े काम में लगे हैं। बहरहाल, माँ -बेटी की बातचीत को पारदर्शी रखने का भरपूर प्रयास किया गया है। यह बातचीत काल्पनिक नहीं। बल्कि पूर्ण रूप से घटित हुई है, मगर हाँ एक दिन और एक समय का संवाद नहीं यह। यह संवाद कुछ दिनों के लगातार संवाद का संचयन है।
माँ : तुम यह सब, बिना रात-दिन देखे, अपना खाना-पीना सब भूल कर, घंटों लगी रहती हो, अपना पढ़ना-लिखना भी भूल कर, यह सब किस के लिए है?
बेटी : ज़ाहिर है माँ, एक छोटा प्रयास है कि दुनिया थोड़ी और खूबसूरत और मानवीय हो जाए इसकी । चेतना के स्तर पर हम सब मिलकर आगे बढ़ सकें। सब जानती हो फिर क्यों पूछ रही इस तरह।
माँ : तुम जो यह सब करती हो इसमें शायद ही कहीं तुम्हारा नाम होता है , तुम्हें नहीं लगता जो कुछ भी तुम करती हो, उसमें तुम्हारा नाम भी होना चाहिए?
बेटी : नहीं। यह सब नाम के लिए नहीं किया जा रहा। ‘नाम’ मेरी यात्रा का हिस्सा नहीं। इस धरती पर नाम कमाने के लिए नहीं आई । कुछ परिवर्तन का माध्यम बनने आई हूँ। आज़ादी के संघर्ष में इतने लोगों ने अपना पूरा परिवार, जीवन चुपचाप बलिदान कर दिया – क्या हम उन सब के नाम जानते हैं? हम सब जिस तरह जी रहे, उस जीवन, उसके हर आराम को पाने में अनगिनत लोगों का योगदान है, हम क्या उन सब के नाम जानते हैं, नहीं न? तो फिर ! यह बात माँ तुम बार बार मत किया करो। इसे समझना होगा, तुम्हें ।
माँ : तुम्हें लगता है कि मैं जो कह रही वह ग़लत है। ठीक है। मगर वास्तव में तुम ग़लत कर रही। पहले भी कई बार तुम्हारे काम को लोगों ने अपने नाम से लिखा है, छापा है। तो फिर ऐसा करो जो किताबें तुम लिख रही या छपने वाली हैं उस पर भी अपना नाम नहीं आने दो , किसी और का भी नाम आ जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है । एक माँ होने के नाते मुझे ग़लत लगता है यह सब। मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता। कम से कम लोगों को यह तो पता चले कि ये जो काम हो रहे उसमें तुम्हारी क्या भूमिका है ।
बेटी : दूसरों के कृत्य का हिसाब लगाने में उम्र निकल जाती है माँ। जीवन इसके लिए नहीं मिला है। वह उनकी ईमानदारी है। वह उनकी चेतना है। मेरी इसमें कोई भूमिका नहीं है। और फिर जिन्होंने भी दूसरे के काम, दूसरों की रचना अपने नाम से चुराया या लिया, वे जानते हैं कि उनकी यात्रा वहीं तक सीमित है। वैसे लोग ज़िंदगी भर ऐसे ही जोड़ तोड़ में रह जाते हैं । वे अपनी संभावनाओं को मार देते हैं। आडंबर, अहंकार में वे उलझे रहते हैं जीवन भर । विद्या या कला उन्हें मुक्त नहीं करती। वैसे लोग पैरासाइट होते हैं, जो दूसरों के आईडिया, काम के सहारे जीवन बिताते हैं। शायद इसीलिए अब कोई जल्दी किसी से यह भी नहीं साझा करता कि वह क्या पढ़ रहा, क्या लिख रहा। और फिर जो बीत गया है उसे क्यों दोहराना। आने वाला हर पल नई चेतना से भरा है माँ। मैं उस नव चेतना के आनंद से स्वयं को वंचित नहीं कर सकती।
माँ : तुमने जवाब नहीं दिया । तो तुम वे किताबें जो लिख रही, जो छप कर आयेंगी, उन पर भी किसी और का नाम आने दो।
बेटी : माँ, यह दो अलग-अलग बातें हैं।
माँ: मुझे नहीं लगता।
बेटी : माँ, लेखन की प्रक्रिया में हम एक अलग यात्रा पर होते हैं। वह यात्रा लेखक की चेतना की यात्रा होती है माँ। हमारी बाहरी दुनिया और आंतरिक दुनिया का समन्वय होता है लिखने की प्रक्रिया में। रचना प्रक्रिया इसलिए तो विशिष्ट होती है। किताब पढ़ते वक्त पाठक उस रचना प्रक्रिया से संवाद करता है। लेखक की चेतना के दर्शन होते हैं, अगर किताब लिखते वक्त लेखक इस प्रक्रिया से हो कर गुजरता है। यहाँ दूसरे का नाम देना उचित नहीं होगा। फिर एक पुस्तक, सिर्फ़ एक पुस्तक नहीं होती। बहुत श्रम छुपा होता है उसके भीतर।
माँ : बहुत खूब। वाह ! तो इसका मतलब जो ये घंटों, दिनों, कई बार महीनों का दिन-रात का श्रम तुम्हारा , जो दूसरों को बहुत छोटा और मामूली दिखने वाले काम में लगता है, उसमें तुम्हारा नाम, या तुम्हारे द्वारा स्थापित संस्था का नाम नहीं आना चाहिए। वाह! यह कैसा तर्क है? तुम्हें पता है सब तुम्हें या तो बेवक़ूफ़ समझते हैं, या बेहद चालाक।
बेटी : माँ, हर माँ को अपना बच्चा बेवक़ूफ़ ही लगता है। और यह क्रेडिट लेने वाली बात बहुत ओछि है, छोटी है । आपको नहीं लगता हम एक निम्न चेतना के निम्न जाल में फँस रहे। प्लीज़ ऐसी बात मत करो। मुझे घुटन होती है ऐसी बातों से। और अगर कोई चालाक समझता है तो इसमें बुरा क्या है। (हंसते हुए, ताकि माँ का तनाव कम हो सके)
माँ : इस घुटन का सामना करो। दुनिया का सच तुम्हारे लिए नहीं बदलने वाला। तुम शुरू से बहुत मेहनत करती आई हो अलग-अलग तरह के छात्रों पर, अपने छात्र जीवन से। घंटों, महीनों, कुछ को तुमने सालों दिया है अपना। अपना खाना पीना, ज़रूरी काम छोड़ कर, कॉलेज के छात्रों को पढ़ना, लिखना, सोचना, देखना सिखाया है, हर किसी को उसके अपने अंतस् से जोड़ने का माध्यम तुम बनती रही हो। और तो और जो कला के छात्र आये तुम्हारे जीवन में उन्हें सिर्फ़ तुमने कला की बारीकियों को नहीं सिखाया बल्कि जो उनके अपने कॉलेज, विश्वविद्यालय के शिक्षक शिक्षा नहीं दे सकते वह तुमने उन्हें दिया है। उनकी हर कला रचना को तुमने जैसे ख़ुद अपनी चेतना में पहले रूप दिया और हर एक रेखा, रंगों का संयोजन, रचना की यात्रा कैसे अपने गंतव्य तक पहुँचेगी -वह बताया है, वह सिखाया है। एक शिक्षक भी इतना नहीं करता। और कॉलेज, यूनिवर्सिटी के शिक्षक करते हैं, तो उन्हें इसके लिए अच्छी तनख़्वाह मिलती है । यह उनका धर्म है कि वह पूर्ण ईमानदारी से छात्रों का मार्गदर्शन करें, उन्हें दिशा दें। उन्हें छात्रों की वाह -वाही मिलती है । सम्मान मिलता है। शिक्षक बड़ी शान से लोगों को कहते हैं कि ये हमारे छात्र हैं। तुम्हारा क्या? अरे तुमने जिन्हें तैयार किया, वो एक बार तुम्हारा नाम लेने की बात तो दूर, कुछ तो तुम्हें आदर सूचक बोध से बुलाते भी नहीं। उनके भीतर इतनी तमीज़, शर्म और ईमानदारी भी नहीं कि वह तुम्हारे जीवन के इतने महत्वपूर्ण समय को, तुम्हें सम्मान दें। वे तुम्हें तुम, तू से बुलाते हैं। जबकि वह तुमसे उम्र ही नहीं हर तरह से छोटे हैं। दूसरों के सामने यह बताने कि बात तो दूर कि कैसे उनके काम में तुम्हारी कितनी अहम भूमिका है । तुम इन्हें ईमानदारी सिखाती आई हो, मैं अक्सर इनसे तुम्हारी होने वाली बात सुनती हूँ। हॉल में अक्सर बैठ कर या काम करते तुम बात करती हो, मैं और तुम्हारे पापा जी भी सुनते हैं। अक्सर हम हैरत में पड़ जाते हैं कि तुम कितनी बारीकियों से, कितने सारे विषयों पर इस अपनेपन से बात कर लेती हो, जैसे हर विषय तुम्हारा है।
मुझे यह सब ग़लत लगता है। एक माँ होने के नाते नहीं। एक मनुष्य होने के नाते भी। तुम हर तरह के शोषण के ख़िलाफ़ लड़ती हो घर, बाहर सब जगह तो फिर ख़ुद का शोषण करने की किसी को इजाज़त कैसे देती हो?
बेटी : बाप रे माँ, बस भी करो ! इतना ग़ुस्सा स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं।
माँ : नहीं, मैं ग़ुस्सा नहीं कर रही। बात कर रही तुमसे।
बेटी : तो फिर आराम से बात करो ना । हम फिर कभी बात करेंगे।
माँ : नहीं, मुझे आज बात करनी, और अभी। प्लीज़। मैं अंदर ही अंदर बहुत परेशान रहती हूँ यह सब देख कर। मैं भी तो जानूँ कि तुम्हें वह क्या नहीं दिखता, जो मुझे दिख रहा, या फिर देख कर अनदेखा कर रही तुम ?
बेटी : क्या बोलूँ माँ। मैं थक जाती हूँ ऐसी बातचीत से। यह सब… मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि तुम इन सब बातों को लेकर इतना परेशान रहती हो। माँ, हम बात करते हैं आराम से। मगर तुम परेशान ना हो। बैठो माँ, बैठ कर बात करते हैं। ऐसे तुम कोई काम कर रही, मैं कुछ कर रही। ऐसे बात नहीं करते हैं । पास बैठ कर बात करते हैं। देखो, मेरी हथेलियाँ तुम्हारी हथेली में हैं, अब ध्यान से सुनना। जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मैं पढ़ रही थी, एक घटना ने मेरा जीवन बदल दिया। जैसा कि तुम अच्छी तरह जानती हो कि मेरी हर बात को परिवार और आस-पास के लोगों द्वारा अव्यावहारिक और मुझे अतिसंवेदनशील माना जाता था । और मेरी हर बात लगभग ऐसे ही ख़ारिज हो जाया करती थी।। कई बार सुनी भी नहीं जाती। अक्सर यही कहा जाता कि ये किताबों की बातें हैं। नहीं, पापा जी और तुम्हारी तरफ़ से ऐसी कोई बात नहीं की जाती। मेरा आत्मविश्वास बहुत कमजोर हो गया था। मैं स्वयं को हमेशा प्रश्न करती मगर फिर भी हर तरह से ख़ुद को परखने के बावजूद मुझे लगता कि नहीं मैं तो जो कह रही वह सबसे व्यवहारिक बात है। ख़ैर! एक रोज़ मैं प्रोफेसर अभिजीत पाठक जी के क्लास में अनुमति ले कर बैठ गई। उन्होंने पढ़ाते वक़्त सूर्योदय और सूर्यास्त के सौंदर्य का वर्णन किया। उसी क्षण मेरा आत्मविश्वास लौट आया। मैंने सोचा – एक इतना बड़ा, विद्वान प्रोफेसर, जिनका सब इतना सम्मान करते हैं, जिन्होंने इतनी अच्छी अच्छी किताबें लिखीं हैं, वे जब किसी पश्चिम के समाजशास्त्र सिद्धान्त को पढ़ाते हुए सूर्योदय और सूर्यास्त की बात कर सकते हैं, तो फिर ना ही मेरा सोचना, ना ही मेरा जीना और ना ही मेरा लिखना अव्यावहारिक है। मेरा आत्मविश्वास लौट आया। और उसी के बाद मैंने एक इंटरनेशनल सेमिनार में पढ़ने के लिए एक पेपर लिखा, जिसे आस-पास के लोगों ने फिर अकादमिक और हर तरह से अव्यावहारिक और बेकार बताया। लोगों की आलोचना के बदले यही कह सकी मैं दबी ज़बान में कि अगर जो मैं सोचती हूँ वह ही अगर ना कह सकूँ तो फिर विश्वविद्यालय की पढ़ाई का क्या मतलब। और मैं कुछ भी हवा में नहीं कह रही। पुराने सिद्धांतों को रखते हुए, नई की बात रखने का प्रयास कर रही। मैंने किसी की ना सुनी। पेपर सेमिनार में वैसे का वैसा ही पढ़ा। यही पेपर यंग स्कॉलर प्राइज के लिए चयनित किया गया और फ़िनलैंड का निमंत्रण मिला।
माँ प्रोफेसर पाठक कुछ नहीं जानते थे कि उनकी कक्षा में चुपचाप सकुचाई सी ‘छात्रा’ के मन में क्या चल रहा। उनकी पढ़ाने की शैली वह थी। कोई बनावट नहीं था। अगर बनावट होता तो मेरा खोया आत्मविश्वास नहीं लौटता। सर हर तरह से बहुत उच्च मनुष्य हैं। फिर भी उनका कुछ छात्र और प्रोफेसर मजाक उड़ाते थे। एकाध ने उन्हें अपमानित भी किया हमारे सामने। सच कहूँ, मैं उस समय समझ ही नहीं पाई कि क्या हो रहा, क्योंकि मेरी कल्पना के परे था कि सर का भी कोई मजाक उड़ा सकता है। बाद में समझ आया।
माँ, हम कुछ पाने के लिए नहीं करते हर काम जीवन में। यहाँ तक कि सम्मान पाने के लिए भी नहीं । अगर कोई सम्मान नहीं करता तो वह उसके भीतर की हिंसा है। क्योंकि अगर एक क्षण के लिए भी किसी ने हमें कुछ दिया, तो सम्मान का भाव अपने आप उत्पन्न हो जाता है। फिर माँ जवानी में ऐसा अक्सर होता है, हम अपने आप को सबसे बड़ा मानने लगते हैं। तो सहज ही दूसरे छोटा दिखने लगते हैं। तुम इन बातों के ऊपर इतना मत सोच कर दुखी हो।
माँ : मगर मुझे अच्छा नहीं लगता। आने वाले कल में ऐसा ना हो।
बेटी : माँ, यह मेरी चेतना पर निर्भर नहीं। व्यर्थ ज़्यादा मत सोचो ।
माँ : एक बात बताओ यह जो संस्था तुमने बनाई है किसलिए है?
बेटी : आप क्यों पूछ रहीं हैं, यह सब।
माँ: मुझे उत्तर और स्पष्टता चाहिए।
बेटी : दुनिया भर के बच्चों के लिए, सब के लिए।
माँ: यह संस्था किसकी है?
बेटी : सबकी है माँ। ये कैसे प्रश्न हैं?
माँ : ऐसे तमाम संगठन, संस्था, व्यक्ति या समूह के लिए जो तुम काम करती हो वह एक व्यक्ति के रूप में करती हो या एक संस्था के रूप में?
बेटी : क्या माँ, मुझे मत बॉटों। कोई भी संस्था मेरी सीमा नहीं हो सकती। कोई संगठन मुझे बांध नहीं सकता, ना ही एक व्यक्ति के रूप में मैं स्वयं को इतना संकुचित कर सकती हूँ कि किसी संगठन, या किसी संस्था में अपनी भूमिका को ले कर मैं असुरक्षित महसूस करूँ। यह मत भूलना कि मैं स्वयं को धरती और आकाश की विशालता में समाहित पाती हूँ। मेरा जन्म अब तक लोगों द्वारा कि गई ग़लतियों को दुबारा दोहराने के लिए नहीं हुआ है।
माँ: क्या जिन संगठनों, संस्थाओं, स्कूलों, व्यक्तियों और ऐसे तमाम लोग और बच्चे जिनके लिए पूरे समर्पण से, इतने गहरे प्रेम से, इतनी मुश्किलों के बावजूद तुम काम करती हो क्या वे भी तुम्हें उतना ही अपना मानते हैं? क्या वे तुम पर विश्वास करते हैं? क्या वे भी इस संस्था का हिस्सा हैं?
बेटी : हाँ माँ ! सब इस संस्था का हिस्सा हैं, ठीक वैसे ही जैसे शेफाली सभी संगठन, संस्था, पाठशाला, दुनिया के सभी बच्चे , हर एक आदमी, सृष्टि के कण कण का हिस्सा है। हम सब अलग नहीं माँ। कोई भी अलग अलग नहीं हैं। हम सब एक दूसरे के साथ हैं।
रही बात, माँ उनकी – कि वे मुझे कितना मानते हैं, कितना विश्वास करते हैं, तो माँ, मैं इसलिए तो नहीं कुछ भी कर रही। हाँ, जो करना चाहती हूँ, जो कर रही, जिस उद्देश्य से कर रही अगर उसकी पवित्रता पर उनका विश्वास है, तो फिर बाक़ी बातों का क्या मतलब। तुम और निकट के सभी लोग नाराज़ होते हैं कि जब कोई आगे से नहीं आता, फिर भी तुम पीछे पड़ पड़ कर लोगों को उनकी अपनी भलाई और बेहतरी के लिए तैयार करती हो। माँ, तुम्हें नहीं अच्छा लगता जब मेरे कॉल और मेसेज का लोग जवाब नहीं देते तो एक लंबे इंतज़ार के बाद या तो मैं उनके यहाँ पहुँच जाती हूँ, या फिर उन्हें इतना पुकारती हूँ कि उन्हें सुनना पड़ता है । हो सकता है यह सब आम चलन से बाहर का हो। पर माँ, मैं अगर छोटी छोटी बात देखूँगी तो उन बच्चों का, उन लोगों का क्या होगा जिन्हें उनकी वर्तमान अवस्था से निकालना है। जिनके साथ हमें आगे बढ़ना है। वैसे माँ सभी प्यार करते हैं। तुम क्यों ऐसा लगता है। संस्थाएँ संगठित रूप से काम करने के लिए बनती हैं । एक संस्था हर जगह काम नहीं कर सकती। तो अलग अलग जगह लोकतांत्रिक तरीक़े से काम करने के लिए संगठन की आवश्यकता होती है। और एक संगठन एक जगह भी व्यापक दृष्टि के साथ काम नहीं कर सकती। इसलिए संगठनों को भी मिलकर काम करना होगा ताकि व्यापक दृष्टि का निर्माण हो सके, और व्यापक उदेश्य के लिए काम किया जा सके।
माँ : एक आख़िरी बात पूछ रही, इस संगठन का निर्माण तुमने क्यों किया और मेरे साथ कई लोगों को क्यों जोड़ रही? तुम दूसरे लोगों के साथ एक व्यक्ति के रूप में काम कर रही या एक संगठन के रूप में?
बेटी : माँ, संगठन निर्माण में मेरी दिलचस्पी नहीं थी । मगर जब एक के बाद एक संस्थाओं का बुरा हाल, वही बड़ी बड़ी बातें, मगर आचरण और कर्म में झूठ, दिखावा, संकीर्णता, राजनीति तो काम करने के लिए , इसलिए यह ट्रस्ट बना। जिस रोज़ लगेगा कि इस संगठन में भी काम करने वाले कम और काम दिखाने वाले ज़्यादा लोग जुड़ गये हैं तो इसका विलय करने में मुझे एक मिनट का भी वक़्त नहीं लगेगा। माँ जैसा कि पहले कहा कि ना मैं, ना ही यह संगठन महत्वपूर्ण है, महत्वपूर्ण काम है। मगर काम करने के लिए संगठन की आव्यशकता है।
माँ: तो फिर संगठन और संगठन के काम को लोगों को जानना भी तो होगा। लोगों का सहयोग किसी भी काम के लिए अनिवार्य है। लोग जुड़ेंगे कैसे? तुम्हारे सभी काम इस संगठन से पृथक तो नहीं। तो क्या बुरा हो जब जिनके लिए, जिनके साथ तुम काम कर रही, उनके संगठन के साथ इस संगठन का भी नाम जुड़े। आख़िर तुम और संगठन जब अलग अलग नहीं तो फिर….अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो आगे का काम कैसे होगा। और मुझे नहीं लगता कि किसी को इससे परेशानी होनी चाहिए। दो संगठन, दो प्रयास साथ मिल कर काम कर सकते हैं। करते भी हैं। और जब वाणिज्य में ऐसा होता है, धन लाभ के लिए लोग करते हैं, तो फिर एक व्यापक उद्देश्य के लिए काम करने वाले संगठन तो मिल कर कर ही सकते हैं। और ना करें तो शर्मिंदगी की बात होगी। इसका मतलब होगा उनका उद्देश्य काग़ज़ी है, उनका काम बस प्रगतिशील बनने का दिखावा है, ख़ुद को संतुष्ट करने, ख़ुद के अहं के संतुष्ट करने का माध्यम मात्र है।
बेटी : माँ, मैं तुम्हारी बातों की व्यावहारिकता समझती हूँ। मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई आपत्ति होगी किसी को। मैं आगे से जिन कार्यों में संगठन के नाम की ज़रूरत होगी, उसके मुताबिक़ नाम ज़रूर दूँगी। तुम परेशान ना हो। मगर जो सब हैं, या दुनिया ऐसी है, इसलिए मैं भी वैसी बनूँ, इसकी उम्मीद मुझसे कभी मत करना। मैं फ़ैशन के हिसाब से कपड़े और चाल चलन बदलने वालों में से नहीं। ये बातें बहुत छोटी हैं माँ। जीवन की विशालता को कम कर देती हैं। तुम अपने मन और स्वास्थ्य को इससे प्रभावित नहीं होने दिया करो। बातें करो मुझसे। मन में कुछ भी ना रखो। संवाद ही समाधान है। और फिर जीवन से बड़ी कोई बात नहीं होती- पापा जी हमेशा कहते हैं ना ।
माँ, ना तो मैं चालक हूँ, ना बेवक़ूफ़। दुनिया के सब छल-प्रपंच खूब समझती हूँ। मगर मुझे छल-प्रपंच नहीं बनना है। और ना ही मैं बेचारी हूँ। बेचारा इस दुनिया में कोई नहीं। दुनिया की सबसे भद्दी और गंदी गाली है बेचारा। सादगी बेचारगी नहीं। सादगी सौंदर्य है। सादगी में ही तुम्हारे देव भी बसते हैं।
माँ : (हंसते हुए) अच्छा तो अब तुम्हें हमारे देव भी नज़र आने लगे हैं। मंदिर हम जाते हैं, और ईश्वर तुम्हें नज़र आते हैं ! चलो बहुत हुआ भाषण बाज़ी। अब चाय पिलाओ। चाय के साथ सादगी और सौंदर्य को भी भून कर लाना। चाय के साथ मखाना ।


Bahut hi sadgi se bahut kuch sikha diya aapne Shefali.