प्रेम, त्योहार ,बच्चे और नया वर्ष

वर्ष 2025 जा रहा है। और एक नया साल 2026 आ रहा है। कैसे करेंगे हम सब स्वागत इसका? प्रेम से या फिर नफ़रत से? हम अपने बच्चों को क्या सिखायेंगे इस नये वर्ष में – प्रेम या नफ़रत, आपसी सौहार्द या ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा? यह हमें स्वयं तय करना है, न कि किसी राजनीतिक पार्टी या किसी धार्मिक संगठन को, या फिर इंटरनेट पर दुष्प्रचार फैलाने वाले लोगों को। बच्चे हमारे हैं, यह हमारा अधिकार है कि हम दूसरों के बहकावे में नहीं आ कर बल्कि अपने विवेक से बच्चों को व्यावहारिक और मानवीय शिक्षा कैसी देनी है यह स्वयं तय करें। धार्मिकता का मतलब नफ़रत और घृणा नहीं। बच्चों से घर-परिवार ही नहीं समूचा संसार है। बच्चे हमारे दुनिया को सुंदर बनाते हैं। और अगर हमने अपने बच्चों को नफ़रत सिखाया तो यही नफ़रत हमारे संसार को विद्रूप भी बना सकती है। बच्चों की उपस्थिति हर एक अवसर को विशेष बनाती है।

त्योहार और बच्चे। जिस घर में बच्चे होते हैं, उन घरों में त्योहारों पर एक अलग ही रौनक़ होती है। बच्चों में बड़ों से कहीं ज़्यादा उत्सावधर्मिता होती है। बच्चे अपनी कल्पनाशीलता से किसी भी त्योहार को विशेष बना देते हैं। बच्चों की कल्पनाशीलता एक हद तक कई तरह के बाहरी प्रभावों से मुक्त होती है। हम त्योहारों की कल्पना बच्चों के बग़ैर नहीं कर सकते। इसके विभिन्न चित्रण हमें विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य में देखने को मिल जाते हैं । प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ कहानी एक बड़ा उदाहरण है इसका। इस कहानी में ईद का उल्लास बच्चों के माध्यम से जिस तरह चित्रित किया गया है, उस उल्लास को हम किसी भी त्योहार में बच्चों से प्रकट होता देख सकते हैं।

त्योहार और पर्व शब्द की समाजिकता

क्रिसमस का त्योहार भारत में ऐसा नहीं कि वर्ष 2025 में पहली बार मनाया गया हो। क्रिसमस मनाने का अपना एक इतिहास है। त्योहार मनाने का विशेष उद्देश्य किसी धर्म की उपस्थिति को दर्ज करना नहीं होता बल्कि उत्सवधर्मिता के बहाने मनुष्यता के गुणों को पल्लवित करना भी होता है। समाज के भीतर प्रेम, समरसता, एकता और आनंद व उल्लास साझा करना होता है। त्योहार शब्द की सुंदरता प्रेम और एकत्व को दर्शाती है।

त्योहार और पर्व दो शब्द हैं जो आम तौर पर पर्यायवाची यानी समानानर्थक शब्द की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं। मगर प्रचलित प्रयोगों के कारण इनके अर्थ थोड़े भिन्न हो जाते हैं एक-दूसरे से। हालाँकि वर्तमान बोल-चाल की भाषा में शब्दों के प्रयोग और उनके अर्थों पर ध्यान कम ही दिया जाता है। त्योहार शब्द में व्यापकता है, विशालता है। पर्व शब्द हमें आंतरिक अनुशासन और शुद्धि की ओर ले जाता है। होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस को आम तौर पर त्योहार यानी अंग्रेज़ी में फेस्टिवल के रूप में बोला और समझा जाता है, जबकि अन्य धार्मिक अवसरों के लिए जैसे कि मुहर्रम, छठ आदि के लिए यहाँ बिहार के गाँवों और छोटे शहरों में बोल-चाल की भाषा में पर्व शब्द का प्रयोग होते सुना है मैंने । बिहार में छठ को पर्व की तरह माना जाता है न कि त्योहार के रूप में।
भाषा, बोली की अपनी एक समाजिकता होती है। उसे हम सब को समझना चाहिए। त्योहार शब्द में लोक का विशेष स्थान है, जबकि पर्व शब्द में पूजा-ध्यान के माध्यम से व्यक्तिगत आंतरिक शुद्धि का एक विशेष स्थान होता है। त्योहार का एक अंग पूजा या आराधना ज़रूर होता है, मगर त्योहार शब्द कहीं अधिक सामाजिक है। बोल-चाल की भाषा में त्योहार शब्द में हम लोक परंपराओं, सामाजिक कथाओं, उत्सव, आनंद की उपस्थिति पाते हैं।

वास्तव में मनुष्य जैसे सामाजिक प्राणी, चाहे इतिहास में हम कितने भी पीछे जा कर देख लें, या फिर उत्तर आधुनिक मनुष्य को हम देख लें, त्योहार समाजिक एकता, सौहार्द और प्रेम को स्थापित करने का माध्यम बनती आई है। मौक़े बे मौक़े इसलिए अलगाव की राजनीति त्योहारों पर निशाना साध नफ़रत को फैलाने का काम करती है । उत्सव मनाने के लिए हमारे बग़ल में किस जाति और किस धर्म के लोग खड़े हैं, यह नहीं देखा जाता। जहां एक ओर नफ़रत की राजनीति समाज में अलगाव पैदा करती है वहीं दूसरी ओर आपसी प्रेम और सौहार्द जोड़ता है समाज को । त्योहार संस्कृति का एक विशेष हिस्सा है, और प्रेम इसका आधार। इसलिए त्योहारों का एक विशेष स्थान है मनुष्य जीवन में। और यह सिर्फ़ भारत जैसे देश के लिए ही नहीं बल्कि त्योहार आधार होते हैं साझापन, एकत्व का – इसे हम विश्व भर में देख सकते हैं। भारत की संस्कृति के निर्माण के आधार में त्योहारों की एक विशेष भूमिका है। भारतीय संस्कृति को इतना संपन्न इसलिए मानते हैं कि यहाँ सब मिलकर , सभी धर्म मिलकर त्योहार मनाते हैं- ना कि हिंदू अलग, मुस्लिम अलग, ईसाई अलग, सब अलग अलग- ऐसा नहीं है । प्रेम हमें जोड़ता है और नफ़रत अलगाव पैदा करता है।

त्योहार और बच्चे


हमारे घर में भी सभी त्योहारों को मनाने का रिवाज है। और हम जिस दशक में पैदा हुए उसमें नफ़रत की राजनीति ने आम जीवन को इस तरह नहीं प्रभावित किया था, जितना की आज। बचपन से हम लोग जितने उत्साह से होली, दीपावली आदि मानते आये हैं , उतने ही उत्साह से क्रिसमस भी। ईद के त्योहार के हफ़्ते- दो दिन पहले ही हमारे घर ड्राई फ्रूट्स और सेबइयाँ पिता जी या भाई के मुस्लिम मित्रों के द्वारा पहुँच जाता था। कई बार तो सेबाइयाँ, हलवा की बर्फ़ी आदि बनी हुई ईद के दिन ही आती। हम मज़े से खाते और खिलाते। यहाँ बता देना लाज़मी है कि हमारे घर में कभी भी मांसाहार नहीं बना। शाकाहारी घर में किसी तरह के आग्रह नहीं थे कि फ़लां शाकाहारी भोज्य पदार्थ अगर किसी मुस्लिम के घर से बन कर आया है तो उसका सेवन ना किया जाये । क्रिसमस के त्योहार पर तो हम घर पर पुआल, भूसे से, फूलों से सजाते हैं हर साल 24 दिसंबर को । सहूलियत होने पर केक भी बना करता था किसी किसी साल, इस साल भी बना। बचपन में हम अपने शिक्षकों, मित्रों के घर जाते। नाना प्रकार के व्यंजन खाते। खेलते, गाना गाना, बजाना, सुनना होता । हमें हमारे घर में, हमारे स्कूल में धर्मनिरपेक्षता और एकता का पाठ पढ़ाया गया। हमें संस्कार के रूप में प्रेम करना सिखाया गया। हमारे माँ बाप ने कभी, कभी नहीं नफ़रत करना सिखाया।


तो पिछले क़रीबन चालीस-पैंतालीस साल की तरह इस बार भी कड़ाके की ठंड के बीच बगीचा के एक कोने में हमने सजाया जीसस के जन्मस्थल को । हमारा क्रिसमस ट्री बहुत पुराना है। उसे नन्ही नहीं रंगीन बिजली की बल्बों से सजाया। 24 दिसंबर की रात तीन केक बेक किए। इस बार आस-पास के बच्चों में उत्साह तीन महीने पहले से ही था। गली में मुझे कहीं से भी आता-जाता देख लेते तो रुक कर पूछते – ‘इस बार क्रिसमस मनायेंगे ना हम लोग? आप हमें बुलायेंगी ना? केक बनाइयेगा ना? क्या क्या करेंगे हम उस दिन? कौन कौन सा खेल खेलेंगे?’ ऐसे कई प्रश्नों की झड़ी लग जाती। तो बच्चों की माँग को ध्यान में रखते हुए उनकी पसंद का चाकलेट केक बनाया गया। केक बनाते बनाते रात के साढ़े बारह बज गये। क्रिसमस की पावनता का प्रवाह अंतस् में उतरता गया।

अगली सुबह क्रिसमस की सुबह थी। माँ, पिता जी और मैंने एक दूसरे को गले लग कर क्रिसमस अभिवादन किया। घर से दूर बसे भाई और बहनों का कॉल आया। सबके भीतर उत्साह हर साल की तरह इस बार भी था कि कैसा सजा है इस बार क्रिसमस घर के बाग़ीचे में; शरद ऋतु में खिलने वाले कौन-कौन से फूल अभी खिल चुके हैं, जिनसे सजाया गया है। वीडियो और तस्वीरें साझा की गईं। हमारे लिए यह त्योहार किसी होली, दीपावली से कम नहीं रहा कभी। क्रिसमस मनाने का समय शाम के चार बजे तय किया गया। आस-पास के सभी बच्चों को हमेशा की तरह निमंत्रित कर दिया गया था। हर साल बच्चे समय से एक घंटे पहले ही चले आते थे, कई साल तो दिन भर बच्चों की चहल-पहल रहती, बार-बार आ कर वह देख जाते कि कितनी तैयारी हुई है । इसलिए तैयारी पूरी कर हम बच्चों का इंतज़ार करने लगे। चार, साढ़े चार, पाँच बजने को आये – मगर कोई बच्चा नहीं आया। ठीक पौने चार बजे थोड़ी बड़ी उम्र के कुछ बच्चों का बहुत जोड़ -जोड़ से लुक्का-छिपी खेलने की तेज, बहुत तेज आवाज़ आई। ऐसा जैसे वह बताना चाहते हों कि हम क्रिसमस का बहिष्कार करते हैं। हम आपस में बातें करने लगे, शंका जताने लगे कि कहीं यह अति हिन्दुवादियों के क्रिसमस मनाने के बहिष्कार का प्रभाव तो नहीं; मगर बच्चों पर यह प्रभाव कैसे हो सकता है…. हम निराश हो इन्हीं अटकलों में उलझे थे। एक भी बच्चे के नहीं आने के कारण को समझने की कोशिश कर रहे थे कि इतने में श्रुति आई, वह हतप्रभ रह गई कि अभी तक कोई नहीं आया। उसने कहा, मैं सब को बुला कर लाती हूँ। कक्षा दो और तीन में पढ़ने वाले चार बच्चे आये क्रिसमस मनाने, बाक़ी कोई बच्चा नहीं आया। श्रुति, कार्तिक, दिव्यांशी और श्रेयांश। सब ने लेट होने के अपने अपने कारण बताये। तीन बच्चे घूमने गए थे संतमारीज़ स्कूल के चर्च में, हर साल क्रिसमस के अवसर पर वहाँ उत्सव का मोहौल होता है। चर्च के अंदर- बाहर सुंदर सजावट। सभी धर्म और जाति के लोग मोमबतियाँ जलाते हैं वहाँ। एक तरह का मेला सा लगा होता है संतमारीज़ चर्च में । सभी सज-धज कर जाते हैं- बच्चे, बुजुर्ग, नौजवान। आम तौर पर यह सजावट नये साल की पहली जनवरी तक रहा करता है।

बहरहाल बच्चे आये। ठंड के बावजूद माँ-पिता जी ने भी बच्चों के साथ बाहर गार्डन में बैठना पसंद किया। फिर शुरू हुआ – हंसी, ठहाके, गीत-संगीत का सिलसिला। श्रेयांश अपना गिटार ले आया घर से। उसके गिटार पर सब ने अपना हाथ साफ़ किया। कभी कोई बजाता, तो कभी कोई। सब ने गाना सुनाया। फिर वहीं माँ और बच्चों ने मिलकर केक काटा। जीसस के लिए हैप्पी बर्थडे का गीत गाया। मोमबत्ती प्रज्वलित किया सब ने मिलकर। केक खाया सभी ने । श्रेयांश गीत गाते गाते आसमान की ओर कहीं खोया देखता… देव्यांशी के मन में खूब सारे गाने आ रहे थे… कार्तिक के मन में ढेरों बातें थी बताने को, और ढेरों सवाल पूछने को… श्रुति में एक अलग तरह की गंभीरता थी जो भरपूर उत्साह से भरी थी। समय बीतता गया। ठंड बढ़ने लगी ज़्यादा तो हम सभी कमरे में बैठ गये। सभी ने मिलकर नाश्ता किया। उसके बाद बच्चों ने निर्णय लिया कि कोई खेल खेला जाए। बच्चों ने चार खेल चुने। उन खेलों पर वोटिंग हुई। वोटिंग का तरीक़ा अनोखा था। चार खेलों में से सभी अपनी अपनी पसंद का एक खेल चुनेंगे और एक बच्चा लीडर बनेगा, लीडर की कान में बारी बारी से सभी अपनी पसंद के खेल का नाम लेंगे। उसके बाद जिस खेल का नाम सबसे ज़्यादा बार लिया गया, वह खेला जाएगा। तो चार खेलों में जो लोकतांत्रिक तरीक़े से खेल चुना गया, वह था गीतों की अन्तराक्षी। ज़रा इस गीतों की अन्तरक्षि को खेलने वाले लोगों की उम्र देखिए- कोई 1945 की पैदाइश , कोई 1955 की तो कोई 1980 की और तो और चारों बच्चे 2016-18 के बीच की पैदाइश। सबकी उम्र के हिसाब से गानों के बीच संगत बैठा पाना, गानों से ख़ुद को कनेक्ट कर अन्तराक्षी और गानों का मज़ा लेना – एकदम अजूबा सा लगता है । मगर कमाल था कि नन्हे-नन्हे बच्चे जब सन् 1950 -55 के गाने गाये जा रहे थे, बच्चे उसका रिदम पकड़ कर, उसे दोहरा कर गा रहे थे साथ में। शब्द बहुत ज़्यादा पकड़ न भी पाएँ, मगर वह ताल दे दे कर गा रहे थे। और बच्चों ने तो फ़िल्मी गानों के अलावा भी अन्तराक्षी में गाने गाये। ऐसे ही हम सब बहुत चंद लोगों ने मिलकर रचनात्मक तरीक़े से क्रिसमस का त्योहार मनाया। जिसके केंद्र में वही रहा जो मनुष्य जीवन का केंद्र है- प्रेम। हम सभी प्रेम से और भर गये। प्रेम और रचनात्मकता को पल्लवित किया हम सब लोगों ने अपने भीतर क्रिसमस के बहाने। श्रेयांश ने आते ही पिता जी से बाल सुलभ क्रिसमस से जुड़े प्रश्न पूछे, श्रेयांश की शंका का समाधान पिता जी ने बड़े प्यार से किया। यह संवाद जो उम्र के इतने भिन्न भिन्न व्यक्तियों के बीच हुआ, वह आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण है। हम बच्चों को सिर्फ़ बच्चा ना समझें। बच्चें भी एक व्यक्ति हैं, भले ही वो वयस्क की श्रेणी में नहीं आते, मगर उनका भी एक व्यक्तित्व है और उनके व्यक्तित्व की सबसे सुंदर बात है कि वे फूल की तरह हैं , एक नदी की तरह हैं , हमेशा ख़ुशबू और नयेपन से भरे और परिवर्तन व सीखने के लिए सदैव तैयार।

बाल मनोविज्ञान और नफ़रत के काले बादल

मगर कुछ बच्चे जो अभी 12-13-14 साल की उम्र के हैं, और जो बहुत छोटी उम्र से क्रिसमस मनाने विशेष रूप से आते थे, वह इस बार नहीं आये।यहाँ एक ही गली में रहने वाले बच्चों की ही बात हो रही- जो आये वह भी, और जो ना आए वह भी । किसी को दूर से नहीं आना था।आख़िर ऐसा क्या हुआ कि वे कुछ बच्चे नहीं आये। यक़ीनन जो बच्चे नहीं आये उनके परिवार में क्रिसमस मनाया जाना सही है या ग़लत इस पर चर्चा हुई होगी और अति हिन्दुवादियों के द्वारा दिये गये फ़तवा पर उन्होंने अचानक से यह तय किया कि क्रिसमस मनाने का बहिष्कार किया जाये।

उन माता-पिता के लिए सोचने वाली बात है कि आज वे अपने बच्चों को किसी त्योहार को मनाने से रोक रहे क्योंकि वह किसी दूसरे धर्म का है ! वास्तव में ऐसे माँ-बाप बच्चों को क्या सीख दे रहे? हम बच्चे को किसी धर्म से नफ़रत करना नहीं सीखा रहे, हम बच्चों को एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से नफ़रत करना सीखा रहे। हम अपने बच्चों के भीतर नफ़रत के बीज बो रहे हैं। जहां नफ़रत का बीज बोया जाएगा, प्रेम का पुष्प कैसे खिलेगा? बाल मनोविज्ञान की सबसे सरल बात यही होती है कि आप बच्चों में जो बीज बोयेंगे वही पल्लवित होगा। बच्चों के बेसिक नेचर /मूल प्रवृति का वैसा ही विकास होगा । हमें लगेगा हम किसी धर्म, किसी जाति, या किसी व्यक्ति से बच्चे को नफ़रत करना सीखा रहे, मगर वास्तव में बच्चा नफ़रत करना सीख रहा, और यह नफ़रत कल हो के उसकी प्रवृति, उसके व्यवहार का हिस्सा बन जायेंगी, हमको आपको खबर होने से पहले। वैसे ही आज की दुनिया में ग़ुस्सा, नफ़रत और फ़्रस्टेशन को बढ़ाने वाले , उत्तेजित करने वाले ढेरों कारण उपलब्ध हैं । हो सकता है कल यही बच्चा अपने बड़ों के द्वारा अपने मन की बात पूरी न होने पर नफ़रत करने लगे उनसे क्योंकि छोटी छोटी बातें उनके मन-मस्तिष्क पर वही प्रभाव छोड़ेंगे जो हमने उनके मन में औरों के लिए डाला है- नफ़रत के बीज ।

हमें भूलना नहीं चाहिए कि जिस उम्र में हम बच्चे को नफ़रत सीखा रहे, वह उम्र कितना संवेदनशील है। इसी उम्र में बच्चों के भीतर, चाहे उसका लिंग कोई भी हो, ज़बरदस्त हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिनकी वजह से उसकी शारीरिक और मानसिक बुनावट में होने वाले परिवर्तन को उनकी समझ में न आ पाने की वजह से उनके भीतर एक तरह का ग़ुस्सा, खीझ आदि जैसे भाव उत्पन्न होते हैं। और यही वह समय होता है जब माँ-बाप, बड़े -बुजुर्ग से बच्चे स्वयं को धीरे-धीरे किसी बहाने काटने लगते हैं। बच्चों को लगने लगता है कि ये बड़े हमारी बात कभी नहीं समझ सकते। वह बाहर से दर्शायेंगे कि परिवार उनके लिए सबसे अहम है मगर भीतर ही भीतर कुछ और चल रहा होता है। ऊँची आवाज़ में बात करना, गुस्साना, चिल्लाना आदि या फिर इंटरनेट या अन्य नशे या ग़लत लत की ओर झुकाव का पैदा होना, ऐसे में स्वाभाविक है। जो बच्चे कम बोलते हैं, उनके लिए यह और भी घातक होता है। कम बोलने वाले बच्चों के भीतर के परिवर्तन को सूक्ष्म रूप में देखने-समझने की आव्यशकता होती है, मगर आम तौर पर आज के माता -पिता के पास इतना समय नहीं होता।

किसी और से नफ़रत करना, या ‘अदरनेस’ (otherness) , ‘दूसरेपन’ का बोध बच्चों में पैदा करते हुए शायद ही कोई माँ या पिता यह समझ पाते हैं कि मूल रूप से यह ‘अदरनेस’, ‘दूसरेपन’ का बोध वह स्वयं अपने लिए अपने बच्चे में पैदा कर रहे हैं। कुछ साल बाद जब बच्चा बड़ा होता है, ख़ासकर लड़के, जब उन्हें माँ -बाप के अलावा कोई साथी मिलता है, सहारा मिलता है तो यह sense of otherness माता-पिता या अन्य परिवार के सदस्यों के लिए प्रकट होना शुरू होता है- यह आम तौर पर देखा जाता है।
कितना हास्यास्पद है कि क्रिसमस , ईद या गुरुनानक पर्व मनाने से आपका हमारा धर्म ख़तरे में पड़ जाता है। धर्म मनुष्य के भीतर की मनुष्यता को निखारता है। आज भी तुलसीदास जी का रामायण पढ़ते हुए इतना कुछ सीखने को मिलता है। वही बात गीता या श्री अरविंद की सावित्री जैसे महाकाव्य को पढ़ते हुए महसूस होता है। मुश्किल तो यह है कि हम विवेकहीन भीड़ में तब्दील होते जा रहे, जिनका धर्म से भी कोई लेना-देना नहीं। आज के समय में हमें बस नफ़रत से लेना -देना रह गया है।

नफ़रत करना बहुत मुश्किल होता है क्योंकि जब हम नफ़रत करते हैं तो हर समय, हर क्षण हम संदेह, नकारात्मकता से भरे होते हैं । जबकि प्रेम करना बेहद सरल। क्योंकि प्रेम की अवस्था में हम प्रेम की सकारात्मक ऊर्जा से भरे होते हैं, जो हमारे निजी जीवन में भी समरसता बनाये रखता है और हमें हर परिस्थिति को सँभालने की ताक़त भी देता है। बेहद सरल बात है यह। जिसकी समझ आ जाए, वह गंगा नहाए। जिसकी समझ ना आए वह जीवन को स्वयं के लिए और औरों के लिए नरक बनाये।

अब यह हम पर है कि वर्ष 2026 में हम दुनिया को कैसा देखना चाहेंगे। चारों तरफ़ नफ़रत की मार-काट व तनाव या फिर हम और हमारे बच्चे मिलकर नफ़रत की जगह प्रेम के बीज बो कर एक बेहतर दुनिया का निर्माण करेंगे। मैं एक बेहतर, प्रेम से भरी दुनिया की ओर एक कदम आगे बढ़ाते हुए नये वर्ष में प्रवेश कर रही – मेरे साथ दुनिया भर की माँओं का आशीष है और इस दुनिया के सभी नन्हे फ़रिश्तों (बच्चों) का साथ है। यकीनन मैं अकेले नहीं, आप सब मेरे साथ हैं – भला नफ़रत पाना और करना कौन चाहता है इस दुनिया में !
वर्ष 2026 की प्रार्थना प्रेम के अलावा भला और क्या हो सकती है !

प्रार्थना में
शेफाली

About Dr. Shephali Nandan

Shephali is an independent researcher, writer and educationist.

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