तुम गुरु भी हो, तुम सखी भी,
ज्ञान की ज्योति, प्रीत की रीति भी।
तुम हो ध्यान, तुम हो धारा,
तुम हो जीवन की, मधुर रागिनी।
तुमने पढ़ाया सिर्फ पन्ने नहीं,
जीवन के अनुभव, और रिश्तों की महीन बुनाई।
तुम्हारे पास समय भी था, सहानुभूति भी,
तुम्हारी आँखों में समझ थी
और ख़ामोशी में भी शिक्षा थी।
तुम गुरु हो,पर छाँव सी भी —
जिसमें बैठ कर थका मन सिहरता नहीं,
बल्कि फिर से मुस्कराता है।
तुम सखी हो,पर दिशा जैसी भी —
जो साथ चलते हुए भी,
हमेशा आगे की ओर ले जाती है।
तुम्हारी डाँट में माँ की ममता है,
तुम्हारे स्पर्श में मिट्टी की गरिमा है।
तुम्हारे शब्दों में समय की सादगी,
तुम्हारी चुप्पी में शाश्वत रचा बसा।
तुम हो वो दीप,जो खुद जलता है —
पर किसी बच्चे की आँखों में
उजाले का सपना भर देता है।
तुम हो वो धुन,जो बिना वाद्य बजती है,
मन के भीतर,और वर्षों तक गूँजती है।
तुम गुरु भी हो,तुम सखी भी,
तुम हो ममता, तुम हो नीति भी।
जब दुनिया ने कहा — “तू नहीं कर पाएगा ”,
तुमने कहा — “तू क्यों नहीं कर पाएगा ?”
तुम्हारी उस एक बात में
सारे ब्रह्मांड की ऊर्जा उतर आई थी।
तुम किताब नहीं, जीवन की कविता हो,
तुम बंदिश नहीं, मुक्त रचना हो।
तुम हर सुबह की पहली प्रार्थना,
हर शाम की अंतिम मुस्कान हो।

