दरख़्तों की एक अजीब कैफ़ियत होती है। वे बे-इंतिहा मोहब्बत करना जानते हैं । कही नहीं अनकही को भी सुन लेते हैं।
19 नवंबर 2025 एक बेचैन सुबह थी। उस सुबह के पहले की रात भी उतनी ही बेचैन, जैसे एक सैलाब आये और दरख़्तों को बहा ले जाये अपने साथ। पिछली दस रातें और पिछला दस दिन ऐसा ही था। मगर इस दौर की खोखली व्यस्तता की जंजीरें दरख़्त के समीप जाने नहीं दे रही थीं। सुबह घर से तेज़ी से निकली। घर के कमरे से, बगीचा होते हुए, गेट से बाहर।दरख़्तों के बीच से निकलते हुए नज़रें दरख़्तों को बिना स्पर्श किये निकल गई घर से बाहर, अपने मन की बेचैनी को समेटे। ऑटो। मुज़फ़्फ़रपुर का नेपाली कोठी। जहां थे सच्चिदानंद सिन्हा अपने अंतिम दिनों में । दुनिया भर के दरख़्तों के पितामह। उन तीन -साढ़े तीन घंटों में जो हुआ, बस हो गया।पितामह दरख़्त ने हौले से नन्हे पौध को स्पर्श किया और अपनी विरासत उसे सौंप निकल गये एक अज्ञात यात्रा पर। क़रीबन दोपहर के तीन बजे जब वापस फिर लौटना हुआ, एक शून्य लिए आँखें लौटीं, दरख़्तों के बीच से चलते हुए फिर घर के अंदर। बरामदे में खड़ी जब शून्य में ताकती पहली नज़र आँवले के दरख़्त पर पड़ी, कुछ अप्रत्याशित था, उसके पत्ते अचानक ही पीले हो गिरने लगे।
अप्रत्याशित वेदना को आँवले के दरख़्त ने अपने भीतर समेट लिया था। ये पेड़, ये पौधे, हरीतिमा की यह हरियाली – ऐसा नहीं कि पहली बार इन्होंने मेरी पीड़ा का आलिंगन कर मेरी तकलीफ़ को अपने में समाहित किया हो । पहले भी कई बार इन्होंने मुझे पीड़ा के घनीभूत क्षणों में अपनी छाया में दर्द को रूपांतरित करना सिखाया है । आज मौन में लिपटी इस अथाह वेदना को आँवले के दरख़्त ने अपने ऊपर ले लिया था।
जो बेहतर समाज और दुनिया की संकल्पना लिए जी रहे सच्चिदानंद सिन्हा जी उनके लिए कुछ ऐसे ही थे जैसे तीर्थयात्रियों के लिए तीर्थ। एक भरोसा कि वहाँ जाकर और कुछ नहीं तो – शांति, सहजता और प्रेम की छाँव ज़रूर मिल जाएगी। और यह ताक़त है जो बेहतर दुनिया के संघर्ष को तेज करती है। तभी सभी विचारधारा के लोग जहां कहीं से भी बिहार या मुज़फ़्फ़रपुर आते , एक बार उनसे ज़रूर मिलते।

सच्चिदानंद सिन्हा जी बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर ज़िला के मुशहरी प्रखंड के मणिका गाँव के चमेला कुटीर में निवास करते थे। सच्चिदानंद सिन्हा—एक ऐसे समाजवादी चिंतक, लेखक और कर्मयोगी, जिन्होंने आज़ादी के संघर्ष से लेकर स्वतंत्र भारत के राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तन तक अपने गहन अध्ययन और निरंतर लेखन और श्रम से पीढ़ियों को प्रभावित किया। स्वयं को एक सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में देखने वाले सच्चिदा जी, 98वें वर्ष में प्रवेश करने के कुछ दिनों बाद 19 नवंबर को हम सबको अलविदा कह गए। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि उनका जन्म 30 अगस्त 1928 को मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के साहेबगंज प्रखंड के परसौनी गाँव में हुआ—एक ऐसी माटी में, जिसने उन्हें स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्यों से सिंचित किया।
उनकी जीवन-यात्रा दो शताब्दियों को जोड़ने वाली एक जीवंत पूल की तरह है। वे उस दौर में जन्मे जब स्वतंत्रता संग्राम अपने निर्णायक मोड़ पर था। आज़ादी के लिए समर्पित पिता और नाना के संस्कारों के बीच पले-बढ़े बालक सच्चिदानंद, मुज़फ़्फ़रपुर कॉलेजिएट स्कूल में पढ़ते हुए ही आंदोलन से जुड़ गए—रात के अंधेरे में पोस्टर चिपकाना, पर्चे बाँटना और क्रांतिकारी साहित्य पढ़ना उनकी चेतना का आधार बना। 1946 के सांप्रदायिक दंगों के समय पटना साइंस कॉलेज के छात्र रहते हुए उन्होंने दंगा-पीड़ित इलाक़ों में जाकर सेवा की, और फिर पढ़ाई अधूरी छोड़ समाजवादी आंदोलन के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए।
खेत में मजदूरी से लेकर बंबई में खलासी का काम करने तक, उन्होंने श्रम और संघर्ष को अपने जीवन का हिस्सा बनाया।डिग्री वाली पढ़ाई अधूरी छोड़ देने के बावजूद उन्होंने हिंदी-अंग्रेज़ी के साथ-साथ फ़्रेंच और जर्मन जैसी भाषायें स्वयं सीख के इन भाषाओं के साहित्य भी पढ़े। उम्र के अंतिम पड़ाव तक वे एक युवा छात्र की तरह पढ़ते रहे।उनकी सादगी लगभग अविश्वसनीय थी। कई मायनों में गांधी से भी कुछ कदम आगे।न्यूनतम संसाधनों में जीते हुए भी उनका बौद्धिक संसार असीमित था।
सच्चिदा जी के व्यक्तित्व का कैनवास इतना बड़ा है कि उन्हें विभिन्न कूँचियों और विभिन्न रंगों से जाना जा सकता है। दरख़्तों से उनका लगाव अभूतपूर्व था। सिर्फ़ दरख़्तों से ही नहीं प्रकृति के कण कण से। सीमित साधनों के साथ जीवन यापन के पीछे भी प्रकृति का ही सम्मान था। वे हमेशा कहते -‘और कितना शोषण करूँगा प्रकृति का’।
आज दरख़्तों के बहाने सच्चिदानंद जी के बारे में हम इसलिए बात कर रहे कि आम तौर पर हम किसी भी व्यक्ति को उसके साहित्य, उसके कर्म से जानते हैं। उसकी चेतना का जो महत्वपूर्ण हिस्सा होता है उस पर बात नहीं की जाती। उन पक्षों पर बात नहीं की जाती जो उसकी चेतना निर्माण में, उसके व्यक्तित्व निर्माण में एक बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए मृत्यु पश्चात किसी भी व्यक्ति का महिमागान करते करते हम उसे अपने से दूर कर लेते हैं। चाह कर भी सच्चिदानंद जी को दूर नहीं किया जा सकता। भले ही आप उनके विचार और लेखन पर चाहे जितनी भी बात कर लें, वह जीवंत इसलिए भी रहेंगे क्योंकि उनका जीवन विचारों और आदर्शों से पृथक नहीं था।
उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं था पेड़ों की काट-छाँट। नैसर्गिक रूप से पेड़ों को बढ़ने देना चाहिए- वह यह मानते थे। चमेला कुटीर जहां उनका निवास है लेखिका और सच्चिदानंद जी ने मिलकर कई पुष्प वृक्ष लगाये हैं। उनमें से हरसिंगार यानी श्यूली का पुष्प उन्हें बेहद पसंद था। आनंदित हो वह अक्सर उन फूलों के बारे में बात करते। वह अक्सर बाहर दरख़्तों के बीच ही बैठते और लोगों से मिलना -जुलना भी वहीं पसंद करते। उन्होंने मौसम और दिशा के हिसाब से घर के आस-पास ऐसे दरख़्त लगाये थे कि ठंड में गरम रहता घर, और गर्मी में ठंडक प्रदान करता। सच्चिदा जी के घर में बिजली भी नहीं थी। कुछ साल पहले अपने भाइयों के आग्रह पर उन्होंने बिजली लगवाई। मगर वह स्वयं ख़ुद उनका बहुत कम उपयोग करते थे, अगर कोई आगंतुक आये तो वह ज़रूर गर्मी के दिनों में उसके लिए पंखा खोल देते।
प्रकृति से उनका रिश्ता नाता किसी ऋषि की तरह था। वह कभी भी अस्वस्थ होने पर डॉक्टर को दिखाना पसंद नहीं करते थे। वे हमेशा कहते कि देह स्वयं अपना उपचार करना जानती है। घरेलू उपचार भी जल्दी नहीं लेते।
अपने अंतिम समय में भी उनकी देह ने, उनकी चेतना ने किसी भी प्रकार की दवा को नहीं स्वीकारा। उनकी अंतिम विदाई उन्हें चमेला कुटीर के उनकी प्रिय मधुमालती की लताओं के नीचे मिट्टी को लेप कर चादर पर लेटा कर उनकी उस देह को सभी ने श्रद्धांजलि दी जो अनगिनत कार्यों, उनकी निडरता, उनकी भीतर की बेपनाह मोहब्बत, संयमशीलता, असीम धैर्य और ऋषि गुणों का माध्यम बनी। अपराजय रहा उनका व्यक्तित्व। एक विजेता थे वह, जिसने जीवन के किसी मोड़ पर अपने आदर्शों के अनुरूप जीना नहीं छोड़ा। और आनंद तो असीम रहा। उनकी नन्हें बच्चों सी मद्धम मद्धम हंसी समूचे ब्रह्मांड के साथ जा घुली-मिली है। जिस वक़्त सच्चिदानंद जी की देह मधुमालती की लताओं के नीचे लेटी थी अंतिम विदाई के लिए, दरवाज़े की ओट से लगा विजडम फ्लावर के पेड़ पर नीचे की ओर खिला एक फूल ऋषि मुनियों की तरह शांत समाधि लगाये उनकी देह को एक टक देख रहा था।
ये दरख़्त चमेला कुटीर के, अनकही पीड़ा को सुन रहे थे। उस पीड़ा को भी जो दलित महिलाओं की क्रंदन पुकार से निकल रही थी। वे वही दलित परिवार की महिलाएँ थीं, जिन परिवारों को सच्चिदानंद जी ने मणिका गाँव में सम्मान दिया, उन्हें बसाया था।
सच्चिदा जी का जीवन हमें बताता है कि मनुष्य का मूल्य उसके विचारों और कर्म में होता है, साधनों की प्रचुरता में नहीं।आज उनके जीवन, संघर्ष, और उस सपने को सलाम—जिसने मनुष्य की स्वतंत्रता, सम्मान और बेहतर भविष्य के लिए अपने आप को समर्पित किया। सच्चिदानंद जी की विरासत हमें प्रेरणा देती है कि अपनी-अपनी दुनिया में जीते हुए भी हम बेहतर मनुष्य बनने और एक बेहतर समाज गढ़ने का साहस कर सकते हैं ।
(इस लेख की लेखिका शेफाली, सच्चिदानंद सिन्हा जी की जीवनी की भी लेखिका हैं। सच्चिदानंद सिन्हा जी की जीवनी निकट भविष्य में प्रकाशित होने वाली है। लेखिका ने सच्चिदानंद जी के अंतिम कुछ वर्षों में उनके साथ दुनिया का एक बड़ा हिस्सा साझा किया है।सच्चिदानंद सिन्हा जी की तस्वीर लेखिका के सौजन्य से।)


I have read so many articles or reviews regarding the blogger lovers except this
piece of writing is really a pleasant piece of writing, keep it up.