निजी विद्यालय में फ़ीस को लेकर जितनी मारा-मारी है, उतने ही कठोर नियम हैं फ़ीस नियमित जमा करने के भी। ये विद्यालय अच्छी तरह जानते हैं कि फ़ीस कैसे वसूल किए जाते हैं। छोटे निजी विद्यालय के बारे में तो ज़्यादा नहीं कहा जा सकता मगर मध्यम और उच्च श्रेणी के जो निजी विद्यालय हैं वहाँ आम तौर पर किसी तरह की सहृदयता नहीं दिखलाई जाती है विद्यालय प्रशासन द्वारा फ़ीस को लेकर।
वर्तमान समय में शिक्षा की जो स्थिति है उसमें यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि किसी विद्यालय का प्रधानाचार्य ऐसा भी हो सकता है जो अपने स्कूल के कई बच्चों की फ़ीस का इंतज़ार नौ-नौ महीने कर सके और नौ महीने बाद भी दो-तीन महीने की फ़ीस ले कर इंतज़ार करे बाक़ी फ़ीस मिलने का ।
1990 का दशक था वह।
आज हम यहाँ जिस प्रधानाचार्य का ज़िक्र करने वाले हैं वह किसी छोटे या मध्यम श्रेणी के विद्यालय की प्रधानाचार्या नहीं बल्कि शहर के सबसे बड़े और श्रेष्ठ निजी विद्यालय की । बात हो रही है बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर के सबसे बड़े और श्रेष्ठ स्कूलों में से एक ‘प्रभात तारा’ की। मुजफ्फरपुर में प्रभात तारा स्कूल की शुरुआत 1950 में हुई थी। प्रभात तारा स्कूल, मुजफ्फरपुर एक कैथोलिक अल्पसंख्यक स्कूल है जिसकी स्थापना और प्रबंधन अंतर्राष्ट्रीय कैथोलिक महिला धार्मिक मण्डली के सदस्यों द्वारा किया जाता है, जिन्हें सिस्टर्स ऑफ मर्सी ऑफ द होली क्रॉस के नाम से जाना जाता है। हालाँकि यहाँ अब सभी स्तरों पर वंचित वर्ग जैसे बालिकाओं, आदिवासियों, दलितों, शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांगों पर विशेष ध्यान दिया जाना सुनिश्चित किया जाता है।वर्तमान समय में प्रभात तारा स्कूल तीन विशाल इमारतों में संचालित है, जिसमें लगभग 2500 छात्र पढ़ते हैं।(प्रभात तारा स्कूल के वेबसाइट से साभार)।
जिस समय मैं प्रभात तारा स्कूल में पढ़ती थी वह नब्बे का दशक था। पूरे स्कूल की प्रधानाचार्या सिस्टर लिली चंदनाथिल थीं। तब वह अकेले मोंटेसरी बिल्डिंग, इंगलिश मीडियम, हिन्दी मीडियम और हाई स्कूल को सम्भाल लिया करती थीं। तब एक ही प्रधानाचार्य स्कूल में हुआ करता था। सिस्टर लिली अपने कड़े अनुशासन के लिए विशेष रूप से जानी जाती थीं। यहाँ तक कि शहर के बाहुबली और आपराधिक लोगों की भी अपने सामने वह एक नहीं चलने देतीं थीं। सभी उनसे डरते थे। और यह डर आवश्यक भी था क्योंकि तब शहर बहुत अशांत था। कुछ ना कुछ होता रहता था। अपने कड़े अनुशासन के कारण ही सिस्टर लिली मुज़फ़्फ़रपुर जैसे उस समय के आपराधिक शहर में स्कूल का संचालन निर्भय होकर कुशलता पूर्वक करती रहीं।
सिस्टर लिली को भले ही सब सख़्त मानते थे। मगर उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पहलू है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। वह हृदय से बहुत दयालु रही हैं। उन्नीस सौ नब्बे का वह दशक था जब बिहार में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को नौ-नौ महीने तनख्वाह नहीं मिलती थी। ऐसे में कई शिक्षकों ने आत्महत्या कर ली विवश हो कर। अपने पिता की हम तीन संतान उस दौरान प्रभात तारा स्कूल में पढ़ रहे थे। स्कूल की फ़ीस एक से दो महीने नहीं मिलने पर प्रिंसिपल ऑफिस से बुलावा आ जाता था। कक्षा में चपरासी को भेजा जाता कि फ़लाँ बच्चा को प्रिंसिपल ऑफिस में बुलाया गया है। जब भी किसी बच्चे को बुलाया जाता तो क्लास के बच्चे और शिक्षक भी समझ जाते कि क्या बात है। या तो फ़ीस नहीं जमा हुई होगी, या फिर किसी ने शिकायत की होगी। वह एक तरह से बच्चे के लिए शर्मनाक स्थिति होती थी। भाई -बहनों में सबसे छोटे को कभी नहीं बुलाया जाता था। प्रिंसिपल ऑफिस में जाने की चाहे जो भी वजह हो बच्चे डर से घबरा जाते थे। सोचने लगते कि हमने ऐसी क्या गलती कि सिस्टर लिली ने बुलाया है। सिस्टर लिली का नाम सुनते ही उनकी छवि के रूप में पहले पहल जो छवि सामने आती थी उनकी ही तरह एकदम पतली , लचीली उनकी छड़ी।स्कूल में छड़ी के बारे में नाना प्रकार की किंवदंती फैली हुई थी। स्कूल क्या, पूरे शहर में। उस छड़ी का आतंक पूरे शहर में था। ना जाने कितनी ही कहानी उस छड़ी के बारे में प्रचलित थीं । लिखने बैठूँ तो शायद सौ एक पन्नों की जीवनी ही लिख जाये उस छड़ी की। सिस्टर लिली की तरह ही उनकी छड़ी का भी व्यक्तित्व था। एकदम साफ़ सुथरा, चमकदार, लंबा, पतला और सख़्त। मगर प्रिंसिपल ऑफिस से हर बुलावे में ज़रूरी नहीं कि छड़ी की कोई भूमिका हो। प्रिंसिपल ऑफिस में घुसते ही सिस्टर ने अंदर बुलाया। पूछा -‘पढ़ाई कैसी चल रही? मन लगा के पढ़ती हो? मम्मी पापा कैसे हैं? पापा शहर में हैं या शहर से बाहर हैं?’ ऐसे कुछ प्रश्न सिस्टर एक के बाद एक पूछतीं। डर बना रहता।
इत्मीनान नहीं होता। ऐसे लगता जैसे अब सिस्टर की छड़ी निकल कर आएगी और बरसते हुए बताएगी कि मैंने क्या गलती की है। कोई गलती नहीं भी की हो फिर भी यही लगता कि कोई तो गलती ज़रूर हो गई होगी। मगर सिस्टर ही बात करती रहीं , उनकी छड़ी निकल कर बाहर नहीं आयी। सिस्टर ने कहा -अच्छा, जाओ, क्लास मिस हो रहा है । जैसे ही पीछे मुड़ी, सिस्टर ने कहा, ‘सुनो, पापा को बोलना सिस्टर ने बुलाया है’। चेहरे का रंग उतर गया। सोचा हम तीनों बहनों ने ऐसा क्या किया कि सिस्टर ने पापा को बुलाया है। सिस्टर ने तुरंत मुझे आश्वस्त करने के इरादे से कहा, ‘कोई जल्दी नहीं। जब फ्री होंगे, उनको बोलना आने के लिए।’ पापा जा कर मिलें होंगे। क्या बात हुई होगी, मुझे नहीं पता। मगर हाँ फ़ीस को लेकर ही बुलावा था, इतना तो पता था। मगर सिस्टर ने जिस तरह से बात की वह एक बच्चे के लिए अपमानजनक नहीं था। वह एक बच्चे का मनोविज्ञान समझती थीं। वह यह भी समझतीं थीं कि फ़ीस के नहीं भरे जाने से बच्चों का कोई लेना देना नहीं है । इसके लिए बच्चों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग क़तई नहीं करना चाहिए, ना ही उनके मन में किसी तरह का डर या संशय का ऐसा बोध उत्पन्न हो जिससे वह अपने माँ-बाप से अभद्र व्यवहार करे। यहाँ तक कि जब प्रोफेसर लोगों की तनख़्वाह नौ-नौ महीने नहीं मिलती तो भी वह बच्चों से कुछ ऐसा नहीं कहतीं जो बच्चों के मन-मस्तिष्क पर किसी तरह का कुप्रभाव डाले। कुछ समय बाद ऐसा हुआ कि सिस्टर ने ऑफिस में बुलाना छोड़ दिया। चलते फिरते स्कूल में मिल जातीं तो अलग से बातें कर लेतीं। जब हम थोड़े बड़े हो गये तो हमसे पूछ लेतीं घर का हाल-चाल और पापा को मिलने के लिए कहतीं। पापा के मिलने के बाद कभी नहीं टोकतीं। कई बार ऐसा हुआ कि छह छह महीने पर पिता जी को तनख्वाह मिलती भी तो बस दो महीने की या एक महीने की, उसमें बहुत मुश्किल होता कि क्या किया जाये। बनिया का उधार, स्टेशनरी का उधार, और ना जाने कितने-कितने उधार और बच्चों के स्कूल की फ़ीस। किसे-किसे चुकाया जाए ! तब मुश्किल से पिता जी एक या दो महीने की फ़ीस दे पाते और बाक़ी बकाया रह जाता। सिस्टर कुछ नहीं कहतीं। पिता जी उन्हें आश्वस्त करते। उन्होंने कभी, कभी भी नहीं बच्चों को स्कूल से निकाल देने की बात की, छह छह महीने की फ़ीस तीन-तीन बच्चों का बकाया होने के बावजूद। ज़ाहिर सी बात है, हमारी तरह और भी कई बच्चे होंगे शिक्षकों के । मगर हाँ ज़्यादातर शिक्षकों को बचाया था उनके ट्यूशन ने। जिन कॉलेज शिक्षकों का ट्यूशन अच्छा चलता था वे अपनी आर्थिक स्थिति को फिर भी एक हद तक संभालने में सक्षम रहे।
कहना न होगा कि सिस्टर लिली की उदारता नहीं होती तो हम तीन बच्चे नहीं पढ़ पाते। उनके व्यवहार ने हमारे मन में किसी तरह का अपराध बोध नहीं जन्म लेने दिया कि हमारी फ़ीस जमा नहीं होने के कारण हम बाक़ी बच्चों से किसी भी तरह से हीनतर हैं । और यह एक साल की बात नहीं। कुछ साल चला।
आम तौर पर आजकल जिस तरह से फ़ीस वसूल करने के लिए प्राइवेट स्कूलों में जो होता है, कई हद तक वह मानवीय नहीं है। वहाँ सरोकार और आत्मीयता का बोध नहीं। एक व्यवसायिक रिश्ता मात्र अभिभावक और स्कूल के बीच है। सिस्टर लिली जैसे प्रधानाचार्या को सलाम ! उनकी सेवा को सलाम!
आज भी सिस्टर लिली का हृदय उतना ही विशाल है। रिटायर होने के बावजूद। वह मिलने पर आज भी एक-एक बात इतने विस्तार से पूछती हैं। उनकी बातों में किसी बेहद अपने की आत्मीयता है, किसी अपने की चिंता है। वह पारिवारिक संबंधों के बारे में पूछती हैं, आर्थिक पक्षों, परिवार के बच्चों , उनकी शिक्षा पर चर्चा करती हैं, भविष्य की सुनिश्चितता पर चर्चा करती हैं। उनका सरोकार स्कूल में पढ़े हर एक बच्चे के लिए एक सा है। ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं? ऐसा समर्पण कहाँ मिलता है? ऐसी आत्मीयता कहाँ मिलती हैं? सिस्टर लिली के कड़े अनुशासन ने भले ही कइयों को डराया हो, मगर उन्होंने प्रभात तारा जैसे स्कूल को विषम परिस्थितियों में भी खड़ा रखा, और उनके डर ने कई बच्चों को अनुशासित कर जीवन में कुछ करने के योग्य बनाया।

