बाबा,
तुम अक्सर कहते हो
कुछ न कर पाए हमारे लिए
कुछ न दे पाए अपने बच्चों को
सारा जीवन औरों को दे दिया
बाबा,
तुम अक्सर अपने ख़यालों में
अकेले-उदास निकल पड़ते हो
बीसियों बार सिलवाई
उसी टूटी चप्पल को पहने
उस चप्पल की एक-एक सिलाई
तुम्हारे तलवों से घिस कर
काली हो गई है
तुम्हारी चप्पल के पीछे-पीछे
बीसियों पैबंद लगी
माँ की साड़ी और साया भी
चल पड़ते हैं
अपने बड़े -विस्थापित हुए
बच्चों के पैरों को
पंख देने के लिए
बाबा,
तुम अक्सर सोचते हो
कुछ न दे पाए
कुछ न कर पाए हमारे लिए
बाबा,
सच की तुम्हारी अनवरत लड़ाई
हमारी चेतना का करती रही विस्तार
तुम्हारे ललाट की एक-एक शिकन
हमें बनती रही चेतना संपन्न
तुम्हारी फटीं एड़ियां
हमारी अक्षय ऊर्जा का स्रोत बनीं
तुम्हारी सहज मुस्कान
हमारे सहज-आनंद की
राह के मार्गदर्शी बने
बाबा,
तुम्हारा हर भाषण, तुम्हारी हर कविता
जीवन-सूत्र बन
हमारा क्रांतिकारी अभिनंदन करती
तुमने जो कुछ औरों के लिए किया
वह सब हमारे लिए ही तो था
जो उनके लिए न जीते तो
हम बस
डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर बनकर रह जाते
तुम्हारा पसीना
हमारी रगों में
क्रांतिकारी चेतना बन
कभी नहीं बहता
बाबा

बहुत ही सुंदर कविता । कहीं ना कहीं हर पिता पर चरितार्थ होती है यह कविता ।